शनिवार, 27 जुलाई 2013

परोपकार

एक चिड़िया 
थी बंद एक पिंजड़े में,
गा रही थी 
कोई गीत अपनी मुक्ति का
आर्त स्वर में अपने।
सुना उस स्वरलहरी को
एक पथिक ने
था चला जा रहा जो पास ही में
पथ पर अपने।
था वह क्लांत, व्यथित
तन और मन दोनों ही से
परन्तु
सुनकर पंछी के उस स्वर को
जाना उसने, उसका प्रणयगीत
और
पाया एक नया उत्साह
असीम;
लक्ष्य से मिलन का अपने।
आनंद से तिरोहित हो वह
चल पड़ा उल्लसित मन से
गंतव्य की ओर अपने
विस्मृत कर अपनी व्यथा।
पराधीनता की असह्य पीड़ा में भी
सुख-संतोष की अनुभूति जागी
ह्रदय के किसी कोने में - उस चिड़िया के,
देख कर
उस पथिक की ख़ुशी
और
चमक उसके आँखों की।

-प्रणव कान्त झा
07 नवम्बर, 1996.

शनिवार, 20 जुलाई 2013

मैथिली रचना - ३

हे हम्मर गामक पुरनी पोखरि
पोखरि भीड़क बुढ़बा पीपरि
अछि तोहरा नित शत बेरि नमन.

तोहरे छाहरि में खेला-धुपा
नवजुआन भेल कतेको बचपन,
तोहरे साक्षी कय कर्मक बल
बूढो सभ करथि स्वर्गगमन.

तोहरे झोंझरि में सांझ-भोर
चिड़ियों चुनमुनि करय गुंजन,
दियरि जरा गामक ललना सभ
भावी के करथि शुभकल्पन.

थाकल-मारल जं बाट-बटोही
पावथि तोहर सिहकैत पवन,
आल्हा-सलहेसक तान धरथि
बिसरि अप्पन दिन भरिक थकन.

गामक एका केर कल्पतरु
तों छलाह सिनेहक क्रीडांगन,
गामक मान-पहरुआ तों
फेर भेल कोना ई अधोगमन?

आई गाम बनल अछि कुरुक्षेत्र
दुर्योधन अछि केओ दु:शासन,
आ धर्मराज अछि बौक बनल
कय रहल हारि परदेस गमन.

मानवता कें पहचान बिसरि
किछु सोल्हकन आ किछु बाभन,
अछि खंड-खंड पाखण्ड भरल
मनुक्खक लेल नहि कतहु शरण.

सोदरो में नित रगड़ा-झगड़ा
चंहुदिशि भ रहल बिक्खबमन,
मुँह मोड़ने बैसल नीलकंठ
भयभीत करय सं गरलशमन.

हे पीपरिक गहबर कें ब्रह्मपिंड
तोहरा छह हमरो आत्मार्पण,
बस एक बेरि तों फिरा दहक
तोहर छाहरि, हम्मर नेनपनि,
सम्मतिक बहय फेरि वैह पवन
फेरि करह नेह केर प्रत्यर्पण.

हे हम्मर गामक पुरनी पोखरि,
पोखरिक भीड़क बुढ़बा पीपरि,
दुहु कें कोटिशःअभिनन्दन.

प्रणव कान्त. 01 नवम्बर, 2005.

मैथिली रचना - २

हे ईश्वर!
सुनलंहु - बूढ़-पुरान सं
सदिखन,
पढ़लंहु – पोथियो में 
ठाम-ठाम
जे
व्यापित छह तों अपने
अपन सभ रचना में,
प्रकृतिक कण-कण में
समायल छह तों.
फेर तS,
जखन-जखन कियो हंसैछ-
तोंही हँसैत छह,
जखन-जखन कियो कनैछ-
तोंही कनैत छह,
जखन कियो नीक करैछ-
तोंही करैत छह,
जखन कियो अधलाह करैछ-
तोंही तS करैत छह.
फेर तS,
जं ‘राम’ में तों छलाह-
तं ‘रावणों’ में,
जं ‘मोहम्मद’ में तों छलाह-
तं ‘जहलो’ में,
जं ‘ईसा’ में तों छलाह-
तं ‘फ़िरऔनो’ में.
हे ईश्वर!
यदि तों सृष्टि नियंता छह
तS
एना कियैक होइछ?
कियैक तों सदिखन
‘राम’, ‘मोहम्मद’, आ ‘ईसे’ नहिं होइत छह?

प्रणव कान्त. ०२ जनवरी, २०१३.

अनूदित मैथिली रचना - २

एकटा धिया,
बतियाइत रहय 
एक गोट बेख सं-
तोहर आ हम्मर 
बिधना एक्कहि रंग;
हमरा
गर्भक भीतरे
मारल जाइछ, आ
तोहरा
गर्भक बाहिर.

ओ गाछ,
बेटीक पीर कें
आत्मसात करैत बाजल-
हे हय बहिना!
हम दुहु गोटे मिलियो कें,
की बुझा सकब
अहि मनुक्ख जाति कें, कि
अपने पयर पर
कुरहरि मारब
बुझनुकक काज नहिं?

धिया/धरती केर
उर्वरा थिक
आओर
बेख......नूतनता.
की हमरा-तोहरा बिन
अहि जगत केर
सपनो संभव?

हे माँ शारदे!
तोहरो चरण में
शत-शत प्रणाम.

आब तोंही,
हमरा सभ कें
बुद्धि दे, ज्ञान दे;
जाहि सं
प्रकृति केर
अहि दुहू
अनमोल रचना केर-
महातम बुझि सकी;
अहि दुहू सं-
नेह कय सकी.

हिंदी सं अनुवाद: प्रणव कान्त. १५ फरवरी, २०१३
साभार: नेहा कर्ण.

अनूदित मैथिली रचना - १

कतहु 
पेटक आगि नहीं मिझाय,
तs
कतहु
'तलब'केर अंगार जागल अछि.
कतहु
चुबैत नोर भीजल आँखि सं,
तs
कतहु
'आसव'केर धार लागल अछि.
हमरा लगैत अछि,
आई कतेको गरीबक नेना कें
भुखले सूतय पड़त.
कियैक तs
'मिल'क आगाँ, दारूक भठ्ठी पर
नमहर 'कतार' लागल अछि.
अखबार में पढ़ल खबरि कें मोन पारैत,
की जाने, केहन-केहन सपना आओत?
छत पर टाँगल पंखा कें निहारैत,
लगैत अछि भोरे भs जायत.
हमरा लगैत अछि,
आई एकटा माय, राति भरि करौटे फेरतीह,
बेटी फोन कयने छलन्हि,
'आई राति आबय काल अबेर भs जायत.'
आई-काल्हि,
किछु सहमैत-डेरायल लोक सभ
छत पर दियरि सजबैत छथि,
किछु भीड़ सं बचैत-बचाबैत
बज़ार दिशि जाईत छथि.
हमरा लगैत अछि,
काल्हि शहर में 'कर्फ्यू' लागत अबस्स,
अहि बेर ईद आ दिवाली
संगहि जे अबैत अछि.

हिंदी सं अनुवाद: प्रणव कान्त झा. २७ फ़रवरी, २०१३.


मैथिली रचना - १

उठू बटोही, ओहि बाट चलू,
जे बाट कियो देखल धरि नहिं,
अप्पन हियरा में ओ स्वप्न गढ़ू,
जे स्वप्न कियो सोचल धरि नहिं.

प्रकृति केर सुन्दरतम कृति छी आहां,
ई सुन्दरताक कोन अर्थ कहू?
अछि बिक्ख भरल आकंठ जतय,
ओ सोनक घट लय की करब कहू?

स्वार्थक लेल अहि धरती पर,
के नहिं कौखन यौ जीबैत अछि?
चिरंजीवी रहैत अछि वैह पुरुख,
नित आनक घाओ जे सीबैत अछि?

अछि बाट कठिन परिवर्तन केर,
ई आन्दोलन अछि सरल कतय?
सेज सजल अछि कांटक ई,
सुविधा सं भरल ई महल कतय?
जं लक्ष्य सबल अछि अंतस में,
पथ केर पाथर अछि अटल कतय?

हे वीर उठू, हुंकार करू,
हर विघ्न माथा कें झुका देत,
जं झुकय नहिं, प्रतिकार करू,
पाँछा पग अप्पन हटा लेत.

धीरज, दृढ़ता रखलहुं मोन में,
आहां विजयक अमृत पीयब यौ,
छी विजयीक वंशज आहां,
विजयी भैये कs जीयब यौ.

@ प्रणव कान्त झा.
०२ मार्च, २०१३.

'यात्री' की याद में

हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

थे जीवनपथ के यात्री तुम 
ना रहे कभी निःशब्द कहीं
वाणी तुम्हारी चुप न रही
लेखनी तुम्हारी रुक न सकी
फ़िर शब्दों को मौन छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

रहे जीवन भर यायावर तुम
और मृत्यु का आमंत्रण सुन
उससे भी दो-दो हाथ लड़े
जैसे जीवन भर अन्यायों से
अपने शब्दों के साथ लड़े
फ़िर हाथों का लेखन अस्त्र तोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

निर्मोह चले थे तुम हर पल
हर निर्बल को नव आस दिया
तुम ख़ुद कष्टों के बीच चले
सबके अधरों को हास दिया
फ़िर कोटि नयन में अश्रु छोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

अपनी मिट्टी को अंतिम प्रणाम कर
तुम रूठ चले थे एकबार
पर माँ की ममता से बंधकर
तुम लौट आये फ़िर बार-बार
फ़िर माँ के आँचल से मुंह मोड़
हे यात्री, तुम किस पथ को आखिर चले गए?

तुम बसे हुए हो जन-जन में
कोई भी तुम्हें क्या भूलेगा?
उन्मुक्त हास की यादों में
सदियों जन-मानस झूलेगा
फ़िर-फ़िर आने की आशा दे
हे यात्री, तुम किस पथ को आख़िर चले गए?

प्रणव कान्त झा
21 मार्च, 1999.

मेरा दृष्टिकोण - २

हर वर्ष हमारे देश के हिन्दू मतावलंबी देवोत्थान एकादशी का व्रत रखते हैं, विशेषतः मैथिल ब्राह्मण। जब एक संस्कृति सदियों से अपने अंदर हजारों कुप्रथाओं को जन्म देकर उन्हें महिमामंडित करती हो और उन कुप्रथाओं के अमानवीय कुप्रभावों की तरफ से सहजता से आँख मूँदे पड़ी हो, जब मनुष्य के अंदर बैठा देव अनंत शैय्या से उठने को तैयार नहीं हो रहा हो, उसे अपने मिथ्यास्वप्नों और स्वार्थनिद्रा में आनंद अनुभूति मिल रही हो तो प्रतीकात्मक देवोत्थान सदियों तक करते रहने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। सिर्फ संस्कृतियों के नाम पर ऐसी निरर्थक रिवाजों को ढोते रहने से अच्छा है इन्हें समाप्त कर कुछ सार्थक संस्कृतियाँ और प्रथाएँ बनाई जाएँ। क्षमा चाहुंगा अगर आपकी भावनाएं आहत हुई हों तो। वैसे आज कल अपने देश में भावनाएं आहत होने की प्रथा बड़े ज़ोरों पर है।वैसे ऐसे धार्मिक (चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले हों) लोगों की भावनाएं भी कमाल की होती हैं - जब दूसरों की आहत हों तो आनंद पर अपनी आहत हों तो पीड़ा।

बस इतनी सी ख़्वाहिश है

देखते - देखते 
साल बीत गया यह भी। 
मुड़ कर देखूँ तो 
पता ही नहीं चला 
कब बीत गए
जीवन के 33 साल?
इन सालों में;
हरेक साल ही
लिए संकल्प-
कुछ पूरे, कुछ अधूरे।
हरेक साल के
साथ जुड़ी हैं यादें-
कुछ कड़वी, कुछ मीठी।
हरेक साल में
बने हैं रिश्ते, जिनसे
कुछ दर्द मिले कुछ खुशियाँ।
हरेक साल के
थे अपने कुछ लक्ष्य-
और
अपने तईं जी-जान लगाया
पूरा करने को उन्हें।
अब, जब आज
रुका हूँ लेने को सांसें
तो
देखता हूँ की
बीत गए 33 साल।
लगता है
अभी तो कुछ किया ही कहाँ?
देखने को हैं - सपने बाँकी बहुत
सुनने को है- आवाज़ वक़्त की
छूने को हैं- लक्ष्य अनछुए बहुत
करने को हैं- बदलाव कई
पाने को है- सारा जहां बांक़ी
लेने को हैं- संकल्प और कई
और सबसे ऊपर
लौटाने को हैं- कर्ज़ उन सबके
दिया है जिन्होंने
परवरिश, सपने, आशाएँ, विश्वास और मुस्कान
मेरे जीवन को।
बस इतनी सी ख़्वाहिश है
आने वाले साल में
मेरी।

-प्रणव कान्त झा।
31, दिसंबर, 2012।
जालंधर।

माँ का ऋणी

माँ,
आज भी तुम्हें है-
मेरी हर जरूरत का ख़याल 
अपनी 
हर जरुरत से ज़्यादा।
माँ,
आज भी पहले की तरह-
सहती हो मेरे हिस्से का
हर दर्द बेदर्द बन कर;
मुझे दर्द से बचाने के लिए।
माँ,
आज भी मेरी रक्षार्थ-
झोंक देती हो ख़ुद को
काल की भट्ठी में,
स्वयं को अरक्षित कर भी।
माँ,
लोग कहते हैं-
उऋण हो जाऊँगा मैं
तुम्हें मुखाग्नि देकर,
तुम्हारे हर क़र्ज़ से।
क्या
सच में तुम
ऋण मुक्त कर दोगी मुझे
इस तरह?
माँ,
मैं तुम्हारा ऋणी
रहना चाहता हूँ;
अगले सात जन्मों तक;
तुम्हारा ही बच्चा
होना चाहता हूँ ......माँ।

प्रणव कान्त झा
12 मई, 2013.

मेरा दृष्टिकोण- १

मौजूदा शक्ल में दुनियां का हर धर्म नकारा और बेकार है। धर्म अफीम से भी भयानक नशा है. यह इंसान के विवेक को और अच्छे-बुरे के तर्क की क्षमता को नष्ट कर देता है. यह इंसानियत को कुछ पुराने पड़ चुके प्रतीकों और क़िताबों का बंधक बना कर छोड़ देता है. धार्मिकों का कहना है (चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले क्यों ना हों?) कि ईश्वर का अस्तित्व जीवों और धर्म की रक्षा के लिए है, फिर तो सचमुच ये कौन लोग हैं जिनकी मदद के बगैर ईश्वर और धर्म का अस्तित्व स्वयं ख़तरे में आ जाता है? कभी इस्लाम ख़तरे में आ जाता है, कभी हिंदुत्व, कभी ईसाइयत तो कभी सिक्खी? और अगर सचमुच ईश्वर और धर्म अपनी रक्षा के लिए इन ठेकेदारों पर निर्भर है तो वो हमारी रक्षा किस तरह कर पायेगा? ईश्वर और धर्म के परिकल्पना की जरुरत जंगलों में जानवरों की तरह रहने वाली बर्बर मनुष्य जाति को सभ्यता और इंसानियत से भरे समाज में बदलने के लिए पड़ी होगी.अगर उसी ईश्वर और धर्म की रक्षा का तर्क देकर इंसान सभ्यता और इंसानियत को छोड़ फिर से बर्बरता और हैवानियत के रास्ते पर चल पड़े और उसे सही ठहराने के तर्क गढ़ने लगे तो सचमुच ईश्वर और धर्म के अस्तित्व पर सवाल उठने ही चाहिये. थोड़ी देर को मान भी लें कि तथाकथित ईश्वर पूरे संसार का माँ-बाप है और हम सब जीव उसके बच्चे, तो फ़िर हर बच्चे का माँ-बाप से प्यार जताने का अपना-अपना तरीका होता है। फ़िर किसी एक बच्चे को ये हक़ कैसे होता कि वो दूसरों के तरीक़े को ग़लत और ख़ुद के तरीक़े को सबसे सही बताये? क्या ऐसा सोच कर (सही-ग़लत का फ़ैसला अपने हाथों लेकर) वह दूसरों के हक़ और माँ-बाप के अस्तित्व का अपमान नहीं कर रहा होता? क्या हर धर्म के मानने वाले आज इसी ख़ुद-पसंदी में नहीं जी रहे? अगर ऐसी सोच के साथ प्रतिक्रिया कर उन्हें लगता है कि वो ईश्वर और धर्म की रक्षा कर रहे हैं,तो ऐसे पंगु और लाचार ईश्वर और धर्म मानवता के किसी काम के नहीं। इनका अस्तित्व ख़त्म हो जाना ही बेहतर है।

बाबू जी

बाबू जी,
आभारी हूँ मैं 
सदैव आपका 
कि 
धृतराष्ट्र की तरह
पुत्रमोह में पड़-
दुर्योधन नहीं बनाया मुझे।
आपके
शब्दों की प्रेरणा
कि
'न्यायोचित और मानवोचित मार्ग ही चलना सदैव'
डिगने नहीं देते
कदम मेरे
मुश्किल घड़ियों में भी
जब
बहुत आसान होता है
पथ से विचलित होना
अक्सरहां।
बाबू जी,
मैं कृतज्ञ हूँ
आपका हमेशा
कि
मेरे बचपन से ही
अपने
कठोर अनुशासन के आवरण में
छुपा कर
अपने पितृस्नेह को-
आपने गढ़ा मुझे।
आप ही का
सृजन-
आज
जो भी हूँ;
एक नर्म दिल, न्यायोचित, संवेदनशील, कर्मशील
और
सबसे महत्वपूर्ण
कि
एक मनुष्य बनने को प्रयासरत-
मैं।

प्रणव कान्त झा
15 जून, 2013.

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

आज का मानव

मानव -
कल के मानव ने 
बनना चाहा प्रगतिशील,
परिकल्पना की विकास की, 
श्रम किया 
और 
श्रृंखला बना दी;
आविष्कारों की।
उसने 
सारे कार्यों को 
करवा लिया मशीनों से 
और अंततः 
बना वह आज का-
विकसित मानव।
इस 
प्रगति के होड़ में 
खो दिया उसने-
मानवता को, आदर्शों को, जीवनमूल्यों को 
और 
खोया उसने अपनी संस्कृति/संस्कारों को भी।
यहाँ तक कि 
तिलांजलि दे रहा वह;
पवित्र मानवीय भावनाओं की भी 
इस विकास की 
हुताग्नि में।
आज का मानव-
यंत्रों को रचते-रचते 
स्वयं भी बन गया,
एक यंत्र-मानव।
हाँ,
सचमुच यंत्र ही तो
बन गया वह,
क्योंकि 
यंत्र ही तो होते हैं-
भावनाओं से शून्य।
अक्सरहां
सोचता हूँ मैं,
कि आख़िर 
किन संस्कारों का धरोहर देगा यह 
अपने कल-
अपने भविष्य को?
पर,
कुछ तो देगा ही-
प्रेम नहीं; घृणा सही,
सत्य नहीं; मिथ्या सही,
दया नहीं; निर्ममता सही,
सहयोग नहीं; ईर्ष्या सही,
निश्छलता नहीं; धूर्तता सही,
मानवता नहीं; पशुता सही,  
रचनात्मकता नहीं; विध्वंसात्मकता सही,
कुछ तो देगा ही।
प्रगति की 
मृगमरीचिका में खोया-
आज का मानव,
क्या इन्हीं विषमताओं की नींव पर 
खड़ा करेगा 
अपना स्वप्न-महल?
यदि हाँ,
तो 
तनिक सोचे वह स्वयं ही,
कि 
परिणाम क्या होगा इसका?
सृष्टि क्या होगी उसकी?
कैसा कल, कैसे भविष्य को सिरजेगा वह?

प्रणव कान्त झा 
15 अगस्त, 1996.

शनिवार, 6 जुलाई 2013

सुख-दुःख

पतझड़ के बाद है आता जब बसंत,
फूल हैं मिलते, हरसूं गंध फैलाते हुए.
पहले झुलसती धरा आग सी धूप में,
तब मेघ आते, जलधार बरसाते हुए.

पाषाण सहते हैं प्रथमतः चोट को,
सृजित होतीं आकृतियाँ तब मुस्काती हुई.
दर्द सहती हैं खिचन की तारें जब,
फ़िर निकलती तान मदमाती हुई.

जब है तपता कनक आग की आँच पर,
तब वो बनता, कुंदन ग़ज़ब ढाता हुआ,
जननी है सहती प्रसव की पीड़ जब,
फ़िर जनम लेता, बचपन मुस्काता हुआ.

यूँ देखते हम प्रकृति के हर खेल में,
दुख के पीछे, सुख है आता, मन हर्षाता हुआ.

- प्रणव कान्त झा
20 अप्रैल, 2000 (संपादित-06 जुलाई, 2013).