सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

दिल की बातें - 37

दिलफ़रेब औ' तोताचश्म हर नज़र लगता है
अजीबोग़रीब दस्तूर वाला ये शहर लगता है

बाग़ में घूमते सय्याद, शक्ल में दीवानों की
मासूम परिंदों को नहीं है ये ख़बर, लगता है

गली में लोग निकलते अब बड़ी ख़ामोशी से 
बंदज़ुबानों पर सियासत का असर लगता है

मरने मारने को है तैयार इक दूजे को इंसान
रगों में दौड़ रहा मज़हब का ज़हर लगता है

मज़हबों के बड़प्पन की बातें करते हो दोस्त
हर मज़हब यहाँ तंगदिल, तंगनज़र लगता है

न ग़मशरीक़ कोई ख़ुशी में ख़ुश नहीं है यहॉं
इक बियाबां में हो जैसे अपना घर लगता है

बुज़ुर्गों की शफक़त न किलकारी बच्चों की
बग़ैर रिश्तों का घर सूना सा शजर लगता है

खूं के रिश्तों में भी मतलब से मतलब है यहाँ 
ख़ुद ही आज़माओ तुम्हें झूठ अगर लगता है

इश्क़ की आड़ में मतलब के खेल सधते यों
सच कहूँ, अब मुहब्बत से बड़ा डर लगता है

असर मंतर औ' दुआओं में क्यों नहीं दिखता
यहाँ ख़ुशियों को लगी, कोई नज़र लगता है

- प्रणव कान्त झा
०४ अक्तूबर, २०१६.

जुगनुओं की गवाही

थीं 
जब आँखें नन्हीं
तो 
तारों भरे 
आसमान को देख कर 
हो जाती थीं - एकदम चौड़ी।
अक्सर
आते थे ख़्वाब,
जैसे
क़ैद कर लिया है
तारों को मैंने 
और
टाँग दिया है - घर के कोनों में।
सच कहूँ, 
अक्सर
जी लेता था मैं - वो ख़्वाब, 
जब क़ैद कर लेता 
कुछ जुगनुओं को मुठ्ठी में 
और
बंद कर उन्हें शफ़्फ़ाक मर्तबानों में
टाँग देता उन्हें - सही जगह।
कई रातें 
बिताई गईं - जाग कर,
निहारते हुए - टिमटिमाते जुगनुओं को;
जिन्होंने 
अनजाने सिखाया 
जागती आँखों से सपने देखना।
कई 
अंधेरी और डरावनी रातों में 
साथ रहे ये, 
जैसे
दे रहे हों दिलासा
कि
रात चाहे 
कितनी भी हो डरावनी;
हम हरा सकते हैं - अंदर की रौशनी के सहारे
और
यह भी कि
रात चाहे
कितनी भी हो स्याह;
जाना ही होता है उसे - एकदिन।
उन 
नन्हें जुगनुओं की गवाही में
कई बार
किया वादा ख़ुद से
और 
देखे ख़्वाब कई बार
ख़ुद जुगनू बन कर
औरों की 
अंधेरी रातों की
आशा बन जाने का।
उन
टिमटिमाते 
जुगनुओं की 
नन्हीं रोशनी ने
सालों तक
बारहां
दिखाया है - रास्ता,
जब भी
वक़्त के अंधेरों में 
आने लगा - भटकाव।
मेरे
हमसफ़र दोस्त
प्यारे जुगनुओं!
मुझे 
आज भी
याद हैं वो वादे
पर
क्यों खो जा रही
तुम्हारी रोशनी - जो चली हर वक़्त साथ?
दोस्त!
आज जब
उम्र के सबसे अंधेरे दौर से है -
रहगुज़र मेरा,
कहाँ ढूँढूँ तुम्हें 
कि
खो दिया है मैंने तुम्हें -
उम्र के साथ
और
कंक्रीट के जंगलों ने
विलुप्त कर दिया है -
अस्तित्व तुम्हारा भी।
मगर
इन अंधेरों के पार;
वक़्त 
जब भी खड़ा करे - कटघरे में मुझे,
तुम रहना गवाह
कि 
कभी नहीं भूला मैं;
उन अंधेरी रातों के - सबक़,
उन अंधेरी रातों में किए - वादे।

- प्रणव कान्त झा
03 अक्तूबर, 2016.

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

इन्तिक़ाम

तुम कह रहे 
कि 
लोगे तुम इन्तिक़ाम - 
नापाक इरादों में
अपनी नाकामयाबी का।
हाँ,
जिस मुल्क़ की
बुनियाद ही पड़ी हो -
बंद ज़हन और इन्तिक़ाम के
ईंट-गारे से,
उससे
बस यही तो
उम्मीद कर सकते हैं हम।
जबकि
सदा से ही
हमारे ख़ून में
दौड़ते हैं जरासीम -
शांति और सहअस्तित्व का।
वैसे दोस्त
भूलना भी मत
कि 
अगर हमने सीखा है -
शांति, अहिंसा, सहअस्तित्व;
बुद्ध, महावीर, महात्मा और सीमांत गांधी से
तो 
सिखाया है हमें गौरव रक्षा -
पृथ्वीराज, चंद्रगुप्त, लक्ष्मीबाई और टीपू ने।
हाँ,
ये और बात कि
जैसे
तुम्हारे यहाँ मिलते हैं
कभी-कभी -
ईधी, हकीम सईद, परवीन और मलाला;
हमारे यहाँ भी
मिल जाते हैं - 
जयचंद, मीरजाफ़र, गोडसे जैसे लोग
अक़्सर।
वैसे दोस्त!
ज़रा मान भी लो 
हमारी बात
कि
दरअसल
लेना चाहिए तुम्हें इन्तिक़ाम -
अपने 
ख़ुदपसंद अना से, 
ख़ुदगर्ज़ सियासतदां से,
बेज़मीर कठमुल्लों से,
जो बना रहे तुम्हें -
बंद दिमाग़ क़ौम,
नाकाम जम्हूरियत,
और
दहशतगर्द मुल्क!

- प्रणव कान्त झा
02 अक्तूबर, 2016.