शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - ३३

पेस-पीस-स्पेस
************

आहां जं
अप्पन 'स्पेस'क खोजी में
ध्वस्त करैत छी
ककरो जिनगी'क 'पेस' आ 'पीस';
सहजें प्रमाणित होइत छी -
साहसी आ क्रांतिकारिणी।
मुदा जं
स्थिर रखबा लेल
अप्पन 'पेस' आ 'पीस'
हेरैत छी कखनहुं अप्पन 'स्पेस';
ह'म घोषित भ' जाइत छी -
अत्याचारी आ व्यभिचारी।
ओना
जौखन बनाबैत अछि
अहं अप्पन 'स्पेस' ककरो मोन में,
तखनहि लगैत अछि -
उखड़' अप्पन 'पेस' 
अखर' अनकर 'पीस' दुन्नू।
त'
कियैक नहि हम-आहां
एक-दोसरा'क हिया में बनबैत छी
अपन-अपन 'स्पेस',
जाहि सं कि
बनल रहय सबह'क जिनगी'क -
'पेस' आ 'पीस'।
कियैक त'
जा'धरि बनल रहत
ईर्खा आ स्वार्थ'क 'स्पेस' 
आओर
नहि खोजी क' सकब
अप्पन 'पीस', सबह'क 'पेस' में,
अहिना बनओने रहत अशांति;
अप्पन 'स्पेस' - जिनगी में।

- प्रणव नार्मदेय
३० दिसंबर, २०१६.

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

दिल की बातें - 42

दिल को लगी है ठेस, आँखें क्यों आबशार
तू है दिल्लगी का मारा तेरा कौन ग़मगुसार

दिल था दिया तुमने जिन्हें बड़े ही शौक़ से
ये आज़ाद तबीयत तेरी उनको थी नागवार

तुम्हारी नज़र में इश्क़ का आला मुक़ाम था
उनकी समझ में यह रहा है हुस्न का व्यापार 

यूं प्यार में ख़्वाहिश उन्हें थी इक ग़ुलाम की
जो क़ैद से निकला तो दिल हुआ है दाग़दार

है इक नया सफ़र तुम्हारा मुन्तज़िर ऐ दोस्त
और बीते सफ़र के मोड़ कुछ रहेंगे यादगार

- प्रणव नार्मदेय 
२८ दिसंबर, २०१६.

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - ३२

संबंध'क पुल
*************

की उचित छल
मेल आहां'क - हमरा संग?
उपेक्षा'क चोट सं घाहिल
हम्मर मोन जनैत छल
जे मोसकिल छल निमाह ककरो -
हमरा सन लोक सं।
तैं त'
सक भरि कयलहुं प्रयास हम;
बुझा सकी सभ संबंधित कें
जे बनल छलाह पुल -
हमरा-आहां'क बीच।
मुदा
कहाँ डोला सकलहुं 
एक्कहु टा खाम्ह ह'म
आ से अंतत:
हरदा बाजहि पड़ल हमरे।
संबंध आ संस्कार'क पगहा
छानिए लेलक पैर,
संगहि 
एकटा स्वार्थ आ मोन'क आस सेहो
जे किंसाइत बदलि जाय अहिना -
जिनगी'क रंग!
हमरा-आहां'क मध्य ई बन्हन
कतेक छल मजगूत
एकर बेस थाह त' छल अहीं कें;
कियैक त'
हम्मर सभ अनुमान छल
स्वार्थ'क सोंगर पर टाँगल -
एकटा स्नेहिल घ'र-परिवार'क सपना'क स्वार्थ।
सक भरि लगबैत रहलहुं,
समुच्चा ज़ोर -
नेह, निष्ठा आ आस'क संग
जे
बांचल रहय सभटा पुल,
अनामत - हमरा-आहां'क बीच।
मुदा 
शापित दांपत्य'क धार'क प्रवाह
रसे रसे काटि रहल छल -
हम्मर आत्मा'क कछार कें;
जैं कि
अहूं ध्वस्त करबा'क करैत रहलहुं प्रयास -
ओहि पुल'क गठबंधन कें।
कियैक नहि
बुझि सकलहुं आहां
जे 
बिनु मजगूत खाम्ह'क पुल कें
ह'म आ आहां भ' जायब
जिनगी'क धार कें दू गोट - असंपृक्त कछार।
से देखि लिय' जे
ह'म आ आहां
आबि गेलहुं अप्पन यथार्थ पर
आ साबित भेल जे
अनेर नहि छल हम्मर आशंका;
यैह छल नियति -
हम्मर-आहां'क संबंध'क।
तैं त'
आब हम्मर मोन'क कछार
नहि बनय द' रहल -
कोनो पुल;
अप्पन बाँचल अस्तित्व'क ख़ातिर!
आहां'क संसार में,
हम नहि बनि सकलहुं - आहां सन,
से नहि रहलहुं 
आहां'क संसार'क लायक;
पहिनहुं छलहुं - एकसर,
फेरि रहि गेलहुं - निठ्ठाह एकसर।
की बुझि सकब आहां,
जे अहि बेरि त'
आहां'क संबंध'क दाग
हम्मर नांगट जिनगी'क देह पर
भ' गेल अछि किछु तेना क' देखार;
ई कहाँ रहय देलक हमरा आब
हमरो दुनियाँ कें लायक?
स्तब्ध भेल अछि - हम्मर प्रेमी मोन;
अविश्वास'क शूल उठैत अछि - टूटल हिय सं नित्तह;
एकटा विश्वास'क आ एकटा स्वप्न'क -
ई गति देखैत!

- प्रणव नार्मदेय
२५ दिसंबर, २०१६.

मैथिली रचना - ३१

संक्रमित संबंध
***************

किछु संबंध भ' जाइछ -
जिनगी'क नहसूर;
जं गड़ि जाय मोन में 
अहं आकि अविश्वास'क खैंक
आ 
नहि निकालल जाय ओकरा
समय अछैत।
भ' जाइछ -
संवादहीनता'क पकोई;
भरि जाइत अछि -
अवसाद, ईर्खा, अविवेक आ घृणा'क पीज,
जं नहि हो इलाज एकर -
धैरज, विवेक आ सिनेह'क औखधि सं।
कैयक बेरि
अबडेरि देल जाइछ -
उचित संवाद'क मलहम-पट्टी कें
भ' जाइत अछि ई मारुक;
संक्रमित कर' लगैत अछि -
जिनगी'क देह कें।
अहि सं पहिने कि
होमय लागय आनों संबंध संक्रमित
आकि
मरय लागय जिनगी'क सभ सपना आ जिजीविषा 
अहि संक्रमण सं;
कोनो बेजाय नहि जे भ' जाइ बरु फराक -
ओहि संक्रमित संबंध सं।
जेना कि काटि देब' पड़ैछ -
असाध कैंसर सं संक्रमित अंग
ककरो देह सं;
जिउबा'क आस में।
आख़िर 
एकटा संबंध'क किम्मति पर
कोना मारल जा सकैछ -
जिनगी'क सभटा संबंध आ सपना!

- प्रणव नार्मदेय
२४ दिसंबर, २०१६.


मैथिली रचना - ३०

घाओ
******

जिनगी'क युद्ध में
कैयक बेरि 
घाहिल भ' जाइत अछि मनुक्ख।
से घाओ कोनो भ' सकैछ -
शरीर'क
आकि
मोन'क सेहो,
मुदा
शरीर'क घाओ सं बेस मारुक होइछ -
मोन'क घाओ!
शरीर'क घाओ कें त'
जीति आकि हारियो क'
जीबि लैत अछि मनुक्ख,
मुदा मोन'क घाओ'क धाह
जिउतो मनुक्ख कें दैछ हरा
आ 
जं हारल मोन से मुइले सन!
बेचियो क' ज़र-जजाति
लोक कीनि लैछ औखधि -
शरीर'क घाओ लेल,
जैं कि सहज भेंट जाइछ ई -
हाट-बजार।
मुदा
कहाँ अछि कोनो दोकान
बिकाइत हो जत' मलहम -
मोन'क घाओ लेल!
एकर मलहम त' थिक -
नेह आ सिनेह,
से ई कहाँ कीनि सकल कियो
बेगरता'क घड़ी; टाका-पैसा सं,
खाह ओ होमय कतबो धन्ना सेठ।
शरीर'क घाओ सं व्यथित 
लोक'क कष्ट होइछ - नितांत व्यक्तिगत;
मुदा
मोन'क घाओ ल' जीबैत मनुक्ख 
क' सकैछ सर-समाज कें - घबाह
आकि
मनुक्खता कें सेहो - घाहिल,
कैयक बेरि।
कहलहुं ने,
शरीर'क घाओ सं
बेस मारुक होइछ -
मोन'क घाओ!

- प्रणव नार्मदेय
२२ दिसंबर, २०१६.

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - २९

एकटा प्रश्न
************

औ जी,
एकटा प्रश्न पूछू?
पुछबा सं पहिने पूछि लेलहुं;
कारण,
जे आइ-काल्हि
प्रश्न पूछ' पर सेहो
उठि रहल अछि प्रश्न!
जं तैयो
पुछिए लेल आहां,
त' रहब तैयार
जे उत्तर में दागल जा सकैछ - प्रतिप्रश्न।
ओना,
की कहैत छी?
जं पूछल नहि जाय
तं
प्रश्न की रहत नहि?
ई प्रश्न त'
प्रश्न बनि ठाढ़ रहबे करत!
से 
जं मुँह नहि त' आँखि पूछत,
जं शब्द नहि त' भाव पूछत,
आ जं लोक नहि,
तखन आत्मा त' पुछबे ने करत प्रश्न?
तैं त' मोन कहलक,
पुछिए ली अहीं सं जे
की बिनु प्रश्ने -
आहां पहुंचल जतय,
से होइत कहियो संभव?
नहि ने!
त' फेरि आइ कियैक भ' गेल अछि,
प्रश्न पूछब - अक्षम्य अपराध?

- प्रणव नार्मदेय
१४ दिसंबर, २०१६.

रविवार, 4 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - २८

मोन'क कोन सं
***********

कोनो माई'क रूपा-सोना तों पौती के
कत्तहु बाप'क आँखि'क तारा तों बौआ

कियो हंसि हंसि तोरा तरहत्थी राखल
ककरो बहैत नोर'क बसुधारा तों बौआ

कियो लक्ष्मी कहि धन्न भाग क' पाबैए
ककरो घ'र कें गोबर'क टारा तों बौआ

कियो त' ग'र कें फंदा तोरा बूझि रहल
ककरो ग'र में सोन'क छाड़ा तों बौआ

कियो माथा कें बोझ सदति तोरा क'हय
ककरो जिनगी'क एक सहारा तों बौआ

कियो आंगन'क तुलसी बुझि पूजय तोरा
ककरो घर कें टूटल लतमारा तों बौआ

कियो त' तोरे हिया कें फूल बना राखय
ककरो लेल लोभ'क बंटखारा तों बौआ

कत्तहु चान'क धरती पर तों राज करह
कत्तहु बंदिनी आँगन'क कारा तो बौआ

जं सिया बनि कत्तहु धैरज धयल करह
फेरि दुर्गो बनि क' दैह उतारा तों बौआ

जिनगी में बिनु तोरे रहल कहाँ किछुओ
हमर अकास'क चान-सितारा तों बौआ

- प्रणव नार्मदेय 
०५ दिसम्बर, २०१६.

मैथिली रचना - २७

ओहिना... किछुओ....

मोन'क साध मनहि रहि गेल
सभटा पीड़ हिया सहि गेल

प्रीत भरल जिनगी केर सपना
सदिखन हम्मर मन देखल जे
लागय साँचे सपना चमकैत
प्रेम अकास में चान उगल जे
जा'धरि छुबितहुं चान उचकि क'
मृगतृष्णा छल, ओ कहि गेल

हारल मन आ संग आहां केर
बिधि-बिधना'क मिलायल छल जे
अहि गिरहस्ती के बगिया में
सुन्नर फूल फुलायल छल जे
उपवन गमकाबय सं पहिने
कांट'क बीच कोना रहि गेल

अहं आंहां कें कत' पिड़ायल 
कोन कमी भेल नहि बूझल से
साँच हिया हम रीत निमाहल
कियैक आहां कें नहि सूझल से
हम्मर जिनगी'क बाट सरल छल
तैयो कियैक चलल नहि गेल

हम्मर मन में चमकैत सपना
घुप्प अन्हरिया आंहां भरल जे
प्रेमामृत सं फूल गमकितय
तेकरा जारल'क ईर्खा गरल जे
भ'ल पिचायत दू पाट'क बीच
फकरा ई कबिरा कहि गेल

मोन'क साध मनहि रहि गेल
सभटा पीड़ हिया सहि गेल

- प्रणव नार्मदेय 
०४ दिसंबर, २०१६.

दिल की बातें - 41

कहां रोया कभी, लो अब रो लिया मैंने 
वक़्त का है सितम, सब खो दिया मैंने 
 
तूफ़ां में टूटते, ऊँचे ही दरख़्तों के शजर
ना जाने क्यों, बड़ा ख़्वाब बो दिया मैंने 

इक झोंके से, फूंकेगी आशियाना ये मेरा
जान कर भी इस शमां को लौ दिया मैंने 

बहुत मशहूर रही, बेफ़िक्री ज़माने में मेरी
इक उसके आते ही, सुकून खो दिया मैंने 

मेरे जज़्बात, वफ़ा, इश्क़, भरम और यक़ीं 
उसने कुछ भी न रखा उसको जो दिया मैंने

ख़ुदपसंदी, ख़ुदसरी, ख़ुदगर्ज़ अना, आज़ादी 
जिसकी ख़्वाहिश थी उसे वही लो दिया मैंने

तमामतर रिश्ते जिसे बोझ की तरह से लगे
उसको रिश्तों से यूं आज़ादी ही तो दिया मैंने 

- प्रणव नार्मदेय 
४ दिसम्बर, २०१६.


गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - २६

ओहिना.... किछुओ....

एकटा चन्ना कहियो हमरो
मोन'क आँगन आयल छल
राति अन्हरिया जे देखल त'
हमरो आँखि नोरायल छल

हंसि क' ताकय जखने चन्ना
सगरो छिटकैत छल चानी
हमरा मोन'क कोन-कोन में 
वैह इंजोर समायल छल

कानब खनहि, खनहि में ठठ्ठा
रूसब, बौंसब, हंसि बाजब
हम्मर जिनगी'क सभटा रंग में 
ओकरे रंग घोरायल छल

गाबय गीत प्रीत कें संग-संग
पातर ठोर आ बोल मधुर
हमरे संग जिनगी जीबय लेल
नैन ओकर सपनायल छल

मोन'क तप्पत मरुथल में ओ
शीत'क शीतल बुन्न बनल
जिनगी'क सगरो रौदी-दाही
ओकरा संग हेरायल छल

काल'क देल घाह पर लागय
ओक्कर नेह'क लेप मधुर
हम्मर हिय कें अकाबोन बीच
ओ अड़हुल फुलायल छल

जानि ने कोन नज़रि लागल जे
सुख सभटा सपने रहि गेल
कोन ग्रहण चन्ना कें चोराओल
केहन अमावस आयल छल

एकटा चन्ना कहियो हमरो
मोन'क आँगन आयल छल
राति अन्हरिया जे देखल त'
हमरो आँखि नोरायल छल

- प्रणव नार्मदेय 
०२ दिसंबर, २०१६.

बुधवार, 30 नवंबर 2016

दिल की बातें - 40

रग़ों के दौड़ते ख़ूं में उबाल आएगा
हम चुप रहें तो भी सवाल आएगा

ख़्वाह बन्द कर दो उठती आवाज़ें 
ख़ामोशियों से भी बवाल आएगा

सबके जज्बों को क़ैद कर बेशक
आज ख़ुश हो पर मलाल आएगा

तिरे ज़ुल्म से हैं जो दरहम-बरहम
उनके चेहरों पे भी जमाल आएगा

हो कितना भी रसूख़ ज़ालिम का
पर ज़ुल्मों का भी जवाल आएगा

आँसू नहीं ये, ऐसे राख़ हैं जिनमें 
दबे अंगारों में ही जलाल आएगा

रात कैसी भी हो सियह औ' लंबी
उजाला दिन का बहरहाल आएगा

जहाँ थे तुम कल वां आज है कोई
ना समझे गर वो ही काल आएगा

वक़्त ने तेरी भी क़ाबिलियत देखी
बंदा फिर कोई बाक़माल आएगा

हम रहें ना रहें पर देखना इक दिन
तुम्हें इन बातों का ख़याल आएगा

- प्रणव नार्मदेय 
३० नवम्बर, २०१६.

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

दिल की बातें - 39

क़तरा क़तरा बहता रहा मैं याद में
क़तरा क़तरा इस पिघलती रात में

यह तपिश उन तक रसाई पाए तो
क़तरा क़तरा दिल जला यूँ रात में 

है उम्र बीता जिसको रब से माँगते 
वो है दे गया बस यादें मेरे हाथ में

थी इश्क़ में शिद्दत नहीं शायद मेरे
कि दिल मेरा टूटा ज़रा सी बात में 

इस क़दर बरसी सबा हर फूल पर
हूँ ख़ाली दामन मैं रहा इस रात में

था दुआओं पर यक़ीं यूं तो उम्र भर
तेरी बद्दुआ फिर भी रही है साथ में 

- प्रणव नार्मदेय
०८ नवम्बर, २०१६.




सोमवार, 7 नवंबर 2016

मैथिली रचना - २५

व्यवस्था
********

जिनका 
होयबा'क छल -
कमल'क फूल सन सौम्य,
गुलाब'क फूल सन महमह
आकि
अड़हुल'क फूल सन गुनगर
से
भेल छथि -
कनैल'क फूल।
बरु
रंग जतेक होन्हि -
चोख; आँखि चकचौन्ह करयबला,
मोदा
डारि, पात होइ
कि
शिरा में बहैत द्रव;
अंतर'क गुण माहुरे सन घाती।
से 
होउन्ह कोना नहि?
जाहि सं पनघला
बीयो त'
अछि बिक्खे भरल ने?
ओना 
जे होई
लोक त' औखन
चोन्हियाएल अछि -
फूल'क चोखगर रंग सं।
जेना
काल्हि तक छल -
बेमत्त,
धथूर'क फूल सूंघि
आकि
ओकर बीया चीखि।
छी
पड़ल छगुन्ता में,
की कहिबै एकरा -
व्यवस्था'क भटरूप
आकि
भटरूप'क व्यवस्था!

- प्रणव नार्मदेय
०६ नवम्बर, २०१६.

शनिवार, 5 नवंबर 2016

दिल की बातें - 38

तुम क्या जानो हम पर अब तक क्या क्या बीता
इक बात कहूँ सब हार के मैं बस ख़ुद को जीता

अपने ही तो दिल मेरा यूं रहे लूटते गली गली में 
दे कर सबके सपन सुनहरे हाथ रहा है मेरा रीता

रग रग मेरा टूट रहा क्या जानूँ मैं कैसी थकन से
मन ये मेरा मरा बारहां जिस्म न जाने कैसे जीता

इतने घाव सहे दिल ने, रोएँगे हम किस किस पे
अब जो मिलता दर्द नया वह भी लगता है मीठा

साथ तुम्हारा एक ज़हर बन बैठा मेरी आदत ही
जाम ए मय एक शिफ़ा तुम बोलो मैं कैसे पीता

सब ही तो हैं मेरे अपने मेरे लिए है इश्क़ इबादत
ये कलमा पढ़ बैठा, क्या पढ़ता क़ुरआं ओ गीता

- प्रणव नार्मदेय
०५ नवम्बर, २०१६.


गुरुवार, 3 नवंबर 2016

मैथिली रचना - २४

आस'क टेमी
*************

बीत गेल-
ईहो सुकराती।
पछिला 
किछु बरख सं 
लाधल रहैछ गुजगुज अन्हरिया-
अनिश्चितता'क।
कखनहुं
बहय लगैछ अन्हर-बिहाड़ि-
घृणा आ अवसाद'क।
जे 
सरिपहुं लगाबैछ
अप्पन समुच्चा ज़ोर
मिझा देबा'क लेल;
पुरखा सं जोगाओल/जराओल-
नेह'क दीबा-बाति कें।
मोदा
कतबहु बरजोर
होमय
ई घोर अन्हरिया राति
किछु टेमी आस'क
तैयो जरैत अछि-
ता'धरि;
जा'धरि नहि होइछ-
एकटा न'ब बिहान
आ कि
नहि होइछ उग्रास-
प्रखर सुरुज'क;
न'ब नेहकिरिन संग।

- प्रणव नार्मदेय 
०२ नवम्बर, २०१६.

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

दिल की बातें - 37

दिलफ़रेब औ' तोताचश्म हर नज़र लगता है
अजीबोग़रीब दस्तूर वाला ये शहर लगता है

बाग़ में घूमते सय्याद, शक्ल में दीवानों की
मासूम परिंदों को नहीं है ये ख़बर, लगता है

गली में लोग निकलते अब बड़ी ख़ामोशी से 
बंदज़ुबानों पर सियासत का असर लगता है

मरने मारने को है तैयार इक दूजे को इंसान
रगों में दौड़ रहा मज़हब का ज़हर लगता है

मज़हबों के बड़प्पन की बातें करते हो दोस्त
हर मज़हब यहाँ तंगदिल, तंगनज़र लगता है

न ग़मशरीक़ कोई ख़ुशी में ख़ुश नहीं है यहॉं
इक बियाबां में हो जैसे अपना घर लगता है

बुज़ुर्गों की शफक़त न किलकारी बच्चों की
बग़ैर रिश्तों का घर सूना सा शजर लगता है

खूं के रिश्तों में भी मतलब से मतलब है यहाँ 
ख़ुद ही आज़माओ तुम्हें झूठ अगर लगता है

इश्क़ की आड़ में मतलब के खेल सधते यों
सच कहूँ, अब मुहब्बत से बड़ा डर लगता है

असर मंतर औ' दुआओं में क्यों नहीं दिखता
यहाँ ख़ुशियों को लगी, कोई नज़र लगता है

- प्रणव कान्त झा
०४ अक्तूबर, २०१६.

जुगनुओं की गवाही

थीं 
जब आँखें नन्हीं
तो 
तारों भरे 
आसमान को देख कर 
हो जाती थीं - एकदम चौड़ी।
अक्सर
आते थे ख़्वाब,
जैसे
क़ैद कर लिया है
तारों को मैंने 
और
टाँग दिया है - घर के कोनों में।
सच कहूँ, 
अक्सर
जी लेता था मैं - वो ख़्वाब, 
जब क़ैद कर लेता 
कुछ जुगनुओं को मुठ्ठी में 
और
बंद कर उन्हें शफ़्फ़ाक मर्तबानों में
टाँग देता उन्हें - सही जगह।
कई रातें 
बिताई गईं - जाग कर,
निहारते हुए - टिमटिमाते जुगनुओं को;
जिन्होंने 
अनजाने सिखाया 
जागती आँखों से सपने देखना।
कई 
अंधेरी और डरावनी रातों में 
साथ रहे ये, 
जैसे
दे रहे हों दिलासा
कि
रात चाहे 
कितनी भी हो डरावनी;
हम हरा सकते हैं - अंदर की रौशनी के सहारे
और
यह भी कि
रात चाहे
कितनी भी हो स्याह;
जाना ही होता है उसे - एकदिन।
उन 
नन्हें जुगनुओं की गवाही में
कई बार
किया वादा ख़ुद से
और 
देखे ख़्वाब कई बार
ख़ुद जुगनू बन कर
औरों की 
अंधेरी रातों की
आशा बन जाने का।
उन
टिमटिमाते 
जुगनुओं की 
नन्हीं रोशनी ने
सालों तक
बारहां
दिखाया है - रास्ता,
जब भी
वक़्त के अंधेरों में 
आने लगा - भटकाव।
मेरे
हमसफ़र दोस्त
प्यारे जुगनुओं!
मुझे 
आज भी
याद हैं वो वादे
पर
क्यों खो जा रही
तुम्हारी रोशनी - जो चली हर वक़्त साथ?
दोस्त!
आज जब
उम्र के सबसे अंधेरे दौर से है -
रहगुज़र मेरा,
कहाँ ढूँढूँ तुम्हें 
कि
खो दिया है मैंने तुम्हें -
उम्र के साथ
और
कंक्रीट के जंगलों ने
विलुप्त कर दिया है -
अस्तित्व तुम्हारा भी।
मगर
इन अंधेरों के पार;
वक़्त 
जब भी खड़ा करे - कटघरे में मुझे,
तुम रहना गवाह
कि 
कभी नहीं भूला मैं;
उन अंधेरी रातों के - सबक़,
उन अंधेरी रातों में किए - वादे।

- प्रणव कान्त झा
03 अक्तूबर, 2016.

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

इन्तिक़ाम

तुम कह रहे 
कि 
लोगे तुम इन्तिक़ाम - 
नापाक इरादों में
अपनी नाकामयाबी का।
हाँ,
जिस मुल्क़ की
बुनियाद ही पड़ी हो -
बंद ज़हन और इन्तिक़ाम के
ईंट-गारे से,
उससे
बस यही तो
उम्मीद कर सकते हैं हम।
जबकि
सदा से ही
हमारे ख़ून में
दौड़ते हैं जरासीम -
शांति और सहअस्तित्व का।
वैसे दोस्त
भूलना भी मत
कि 
अगर हमने सीखा है -
शांति, अहिंसा, सहअस्तित्व;
बुद्ध, महावीर, महात्मा और सीमांत गांधी से
तो 
सिखाया है हमें गौरव रक्षा -
पृथ्वीराज, चंद्रगुप्त, लक्ष्मीबाई और टीपू ने।
हाँ,
ये और बात कि
जैसे
तुम्हारे यहाँ मिलते हैं
कभी-कभी -
ईधी, हकीम सईद, परवीन और मलाला;
हमारे यहाँ भी
मिल जाते हैं - 
जयचंद, मीरजाफ़र, गोडसे जैसे लोग
अक़्सर।
वैसे दोस्त!
ज़रा मान भी लो 
हमारी बात
कि
दरअसल
लेना चाहिए तुम्हें इन्तिक़ाम -
अपने 
ख़ुदपसंद अना से, 
ख़ुदगर्ज़ सियासतदां से,
बेज़मीर कठमुल्लों से,
जो बना रहे तुम्हें -
बंद दिमाग़ क़ौम,
नाकाम जम्हूरियत,
और
दहशतगर्द मुल्क!

- प्रणव कान्त झा
02 अक्तूबर, 2016.

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

मैथिली रचना - २३

मोन'क कोन सं
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बड़का बड़का नौलक्खो सभ भहरि भहरि खसैत देखल
उजरल-उपटल, परती-परांत पर बस्ती कें बसैत देखल

नेन्ना भुटका ख़ातिर जे सभ बेचल आत्मा बीच बाज़ार 
ओ हुकरैत-चिकरैत मरला, सभ किछु के अछैत देखल

खन चोर आ खनहि साहु, रूप बदलि जे स्वार्थ सधथि
लोक-ज़माना बदलि गेलै से हुनकहुं ह'म बजैत देखल

छिया-छिया, राम-राम आब जुग ज़माना गारत भे'ल
जाहि मुँह हरसठ्ठे सुनलहुं हुनको ओतहि धंसैत देखल

जे ज्ञानी-ध्यानी, उपदेशक संसार कें मायाजाल कहल
ओहि फाँस में सभ सं आगां तिनकहि हम फंसैत देखल

जुग'क जुग जकरा ओ देखौलनि अछि पैरे तोहर स्थान
सत्ता, शासन, स्वार्थ'क ख़ातिर तकरे पैर खसैत देखल

रंग-बिरंगा जे भरि जिनगी, चिनगी लेसि जीबैत रहला
बीतला बयस में नरक'क भयवश एकरंगा रंगैत देखल

धर्म-जाति के बान्ह कसल जै रीति-रिवाज'क डोरी सं
तकरा तोड़ि आब नवतुरिया कें न'ब बाट चलैत देखल

जं गौरब इतिहास रचल, अनेति'क करिखा से पोतल
न्यायोचित इतिहास'क पथ किछु किरिन उगैत देखल

परिवर्तन छै अटल सत्य से अहीं'क गीता कृष्ण कहल
ओ पीढ़ी घोखबे टा कयलक नव पीढ़ी बदलैत देखल

- प्रणव कान्त झा
२९ सितम्बर, २०१६.







सोमवार, 26 सितंबर 2016

मैथिली रचना - २२

मोन'क कोन सं
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चहु दिशि देखू मनुख मनुख कें मारि रहल अछि
स्वार्थ'क आगां आब मनुक्खता हारि रहल अछि 

नैतिकता आब राखल गेल पोथी में चौंपेति क'
जग तकरे तर्पण लेल गंगाजल ढारि रहल अछि

ढंग पुरनका क'हल जेतै सगरो लोक लाज कें
देखि क' चालनि सूप हिया परचारि रहल अछि

तागल छल ई समाज संबंध'क जाहि सूत सं  
नित दिन तकरे माँझ चौबट्टी जारि रहल अछि

सत्य धर्म नेह'क सभ जे गोड़ल'क पाताल में
से विकास'क झंडा चान पर गाड़ि रहल अछि

जकरे जिम्मेदारी भेटल जग के राह देखाब' कें
सभकें भटका क' ओ निज कें तारि रहल अछि

सदति बनौल'क धर्म नीति जग लोक रीति कें 
से धर्महि देखी जं लोकबेद कें मारि रहल अछि 

पूजे टा लेल बैसल छथि राम त' बूझू मंदिर में 
रावण'क समतूले जग काज सुतारि रहल अछि

अदौकाल सं माँ मैथिली सीबय जाहि फांट कें  
संतान सभ तकरे देखू नित्तहि फाड़ि रहल अछि

ई राति रोकय भरिसक भोरु'क नब किरिन कें
किछु दीप तैयो आस'क टेमी बारि रहल अछि

- प्रणव कान्त झा
२७ सितम्बर, २०१६.


शनिवार, 24 सितंबर 2016

दिल की बातें - 36

रोई न आँखें यूँ न समझ कोई ग़म नहीं 
बिखरा तो बार बार मगर सब्र कम नहीं 
 
सुने हैं जहां के तंज़, रोया है दिल बहुत
ये और बात कि पलकें मेरी पुरनम नहीं

दर्दे दिल के लिए है शिफ़ा उसकी हँसी 
ज़ख़्मे दिल का यहाँ है कोई मरहम नहीं

ज़ुल्म हैं सहे बहुत रिश्तों के निबाह को
उसके दिल में मगर इक ज़रा रहम नहीं 

चला जो उसके दर से मैं होके बदग़ुमान
रोक लेते मेरे पाँव, ऐसी थी क़सम नहीं 

नादानियाँ मेरी, सबको बेपर्दा कर गईं
जाना है उसे ख़ूब, अब कोई वहम नहीं 

इश्क़ और वफ़ा कि जैसे गुज़री उम्र हो
चाह के मिलेगी जो अब इस जनम नहीं 

ख़ुद ही चुनी किरचें मैंने टूटे ख़्वाबों की
तोड़ दे जो हौसला है किसी में दम नहीं 

एक दिन तो ले आऊँगा अपने घर ख़ुशी
राह मुश्किल हो मगर रुके हैं क़दम नहीं

- प्रणव कान्त झा
२५ सितंबर, २०१६.

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

मैथिली रचना - २१

मोन'क कोन सं
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ई जे नबरंग'क संसार भेलै से की करबै
आन्हर-बहीर राजा भ गेलै से की करबै

सब धान बाइस पसेरी सगरो तौल रहल
रिति विचित्र सरिपहुं भेल एत्तै की करबै

राकस पहिरन बदलि सगर दुनियाँ घूमय
आब सन्यासी ब्योपार जुमाबै की करबै

यौ प्रजातंत्र में नबका रजबाड़ा देखलहुं 
फेर घरही युवराजो देखबै त' की करबै

अपटी खेत में रक्षक जान गमाबैत अछि
आ मगरमच्छ सभ नोर गिराबै की करबै

कांकोड़ सन अपन'हिक टाँग घिचैत रहू
कुकुर-बिलाड़ि आँखि देखाबै की करबै

सुपथ गप्प जं बजलहुं, हैत जहल बौआ
गामो रावणे'क जयकारा चाहै की करबै

सभटा छुतहर घैल त' भांगठे भेल छलैक
आब नबको बासन छुतहा भेलै की करबै

हारू हिय जुनि हेतै किछु परिवर्तन संगी
किछु समये जं बेपरीत भेलै से की करबै

- प्रणव कान्त झा
२१ सितम्बर, २०१६.

मैथिली रचना - २०

मोन'क कोन सं
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जिनगी'क साँच-झूठ से सभ हेरिते रहब
हमरा जीवन जिउबा'क से जिबिते रहब

बाट थिक की उचित आओर की सुभीत
बुझू आहां हम त' न'ब बाट चलिते रहब

धर्म-जाति'क भेद आहां कसि धयने रहू
हम ई बन्हन कें तोड़ि आगां बढ़िते रहब

चोट माँझ बाट देब अछि हिस्सक पुरान
नबतुरिया छी ह'म से बरु सम्हरिते रहब

छै इनारे घोरायल भांग कौचर्ज'क एतय
हमरा कर्म'क नशा से बस मताइते रहब

- प्रणव कान्त झा
३० अगस्त, २०१६.

मैथिली रचना - १९

मोन'क कोन सं
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छल निजगुत हमर एकटा खोंता एतै
बूझल छल कहाँ जे बिखरि ई जेतै

सभ अप्पन रहय खाम्ह ढाहय बला
आसहि टा रहल घ'र सम्हरि ई जेतै

भेल चेतौनी सेहो नहि मानल मोदा
सोचल जे भरोस की भहरि ई जेतै

आब बसाते बहल छै माहुर सं भरल
हमरा कहने की अन्हर ठहरि ई जेतै

तैयो हिय में रहल अगबे नेहे सरल
सगरो संसार धरि की पसरि ई जेतै

मोन होइए जे कनितौं मोदा की करू
जं कानब त' दुनियाँ बदलि की जेतै

- प्रणव कान्त झा
२३ अगस्त, २०१६.

मैथिली रचना - १८

सनेस
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जुनि सोचब ई प्रश्न जे औखन
ह'म कतय आ आहां कतय
भाव-सोच स' जं एक रहब सभ
फेरि व्यर्थ प्रश्न जे के कतय

कतहु रही आ कहुना रही मोदा
ई अखियास औ मीत रहय
माय मैथिली सन हित-मीत नहि
सदति सभ'क ई मोन बसय

गौरब बरु सभ अतीत पर राखब 
ई समय, कर्म सेहो मोन रहय
आजु'क कर्महि सं महल बनत ओ
संतति अतीत जे स्मरण करय

बांटल खंडित-खंडित जे सभ कियो
होयब से एक कहिया आ कतय
बिनु एका'क हो उदय नहि किन्नहुं
ई सत्य सदति अखियास रहय

सभ भूल-चूक, लेनी-देनी कें बिसरि
संग चली आ'ब संकल्प रहय
रहत जं कर्म-भाव-आत्मा पवित्र त'
भेंटत सदिखन उद्देश्य अभय

- प्रणव कान्त झा
२९ जुलाई, २०१६.

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

दिल की बातें - 35

इरादों के ज़ोर से ग़रचे तूफ़ाँ बनना
मुश्किल बहुत होता पर इंसां बनना

तीर ए ज़ुबां के ज़ख़्म हैं गहरे होते
कहाँ आसां मरहम सा ज़ुबां बनना

इश्क़ ओ यक़ीं के सुतूं ना हो फिर
कोई घर तो क्या नहीं मकाँ बनना

लेन-देन पे टिके हों कारोबार जहाँ  
यही रिश्तों का होता है दुकां बनना

आसाइशों की हवस बढ़ी इंसानों में
है ख़तरनाक यूं पैसों का ईमां बनना

है दौर बहुत मुश्किल अब तो या रब
आसां है दिलों का अब सामाँ बनना

एक दिल तो हो पुरख़ुलूस मेरी तरह
तो बांकी कहाँ प्यार का जहाँ बनना

जो थे बच्चे बहुत दिल के अमीर रहे
सिक्कों की ग़ुलामी रही जवाँ बनना

- प्रणव कान्त झा
१९ अगस्त, २०१६.