शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

धरती हूँ मैं

तुम सोचते हो,
तुम हो सर्वशक्तिमान!
तभी तो,
कभी तुम नोंचते हो
मेरी हरितिमा को,
कभी क्षत-विक्षत करते हो मुझे
डायनामाइट से,
स्वार्थ हेतु
तुम सदैव नष्ट करने पर तुले हो
मेरी सुंदरता,
मेरी रचनाओं को (जंगल, जल,ज़मीन);
जो अंततः होम होते हैं -
तुम्हारे सुखार्थ।
धरती हूँ मैं,
धारण किया है मैंने तुम्हें -
तुम्हारी हर धृष्टता के बावज़ूद,
सह रही तुम्हारा गर्व,
उद्दंडता, लालच और उच्छिष्ट;
हरपल;
माँ की तरह।
भूल गए हो तुम
कि
मैंने ही बख़्शी हैं तुम्हें शक्तियाँ
कि जिनकी बदौलत हैं -
तुम्हारी सफलताएँ,
वरना
हो तुम अशक्त और निरीह;
जन्मजात।
देखो, सोचो, संभलो ज़रा,
माना मैं हूँ सहनशील
पर
अपनी सीमाएँ पहचानो तुम
ताकि
मुझे अपनी सीमा तो
ना भूलनी पड़े कभी।
तुम भूलो मत
कि
अपनी सारी सामर्थ्य और शक्तियों के बावज़ूद
लाचार रह जाओगे
तुम
जब भी क्रोधित करोगे मुझे,
आख़िर,
जिसमें शक्ति हो सृजन की
उसी से संभव है
विनाश भी।
फ़िर,
यह
तुमसे बेहतर
कौन जानता है
और
मुझसे बेहतर
कौन सिद्ध करेगा?

- प्रणव कान्त झा
18 अप्रैल, 2014.