मौजूदा शक्ल में दुनियां का हर धर्म नकारा और बेकार है। धर्म अफीम से भी भयानक नशा है. यह इंसान के विवेक को और अच्छे-बुरे के तर्क की क्षमता को नष्ट कर देता है. यह इंसानियत को कुछ पुराने पड़ चुके प्रतीकों और क़िताबों का बंधक बना कर छोड़ देता है. धार्मिकों का कहना है (चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले क्यों ना हों?) कि ईश्वर का अस्तित्व जीवों और धर्म की रक्षा के लिए है, फिर तो सचमुच ये कौन लोग हैं जिनकी मदद के बगैर ईश्वर और धर्म का अस्तित्व स्वयं ख़तरे में आ जाता है? कभी इस्लाम ख़तरे में आ जाता है, कभी हिंदुत्व, कभी ईसाइयत तो कभी सिक्खी? और अगर सचमुच ईश्वर और धर्म अपनी रक्षा के लिए इन ठेकेदारों पर निर्भर है तो वो हमारी रक्षा किस तरह कर पायेगा? ईश्वर और धर्म के परिकल्पना की जरुरत जंगलों में जानवरों की तरह रहने वाली बर्बर मनुष्य जाति को सभ्यता और इंसानियत से भरे समाज में बदलने के लिए पड़ी होगी.अगर उसी ईश्वर और धर्म की रक्षा का तर्क देकर इंसान सभ्यता और इंसानियत को छोड़ फिर से बर्बरता और हैवानियत के रास्ते पर चल पड़े और उसे सही ठहराने के तर्क गढ़ने लगे तो सचमुच ईश्वर और धर्म के अस्तित्व पर सवाल उठने ही चाहिये. थोड़ी देर को मान भी लें कि तथाकथित ईश्वर पूरे संसार का माँ-बाप है और हम सब जीव उसके बच्चे, तो फ़िर हर बच्चे का माँ-बाप से प्यार जताने का अपना-अपना तरीका होता है। फ़िर किसी एक बच्चे को ये हक़ कैसे होता कि वो दूसरों के तरीक़े को ग़लत और ख़ुद के तरीक़े को सबसे सही बताये? क्या ऐसा सोच कर (सही-ग़लत का फ़ैसला अपने हाथों लेकर) वह दूसरों के हक़ और माँ-बाप के अस्तित्व का अपमान नहीं कर रहा होता? क्या हर धर्म के मानने वाले आज इसी ख़ुद-पसंदी में नहीं जी रहे? अगर ऐसी सोच के साथ प्रतिक्रिया कर उन्हें लगता है कि वो ईश्वर और धर्म की रक्षा कर रहे हैं,तो ऐसे पंगु और लाचार ईश्वर और धर्म मानवता के किसी काम के नहीं। इनका अस्तित्व ख़त्म हो जाना ही बेहतर है।
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