शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - ३२

संबंध'क पुल
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की उचित छल
मेल आहां'क - हमरा संग?
उपेक्षा'क चोट सं घाहिल
हम्मर मोन जनैत छल
जे मोसकिल छल निमाह ककरो -
हमरा सन लोक सं।
तैं त'
सक भरि कयलहुं प्रयास हम;
बुझा सकी सभ संबंधित कें
जे बनल छलाह पुल -
हमरा-आहां'क बीच।
मुदा
कहाँ डोला सकलहुं 
एक्कहु टा खाम्ह ह'म
आ से अंतत:
हरदा बाजहि पड़ल हमरे।
संबंध आ संस्कार'क पगहा
छानिए लेलक पैर,
संगहि 
एकटा स्वार्थ आ मोन'क आस सेहो
जे किंसाइत बदलि जाय अहिना -
जिनगी'क रंग!
हमरा-आहां'क मध्य ई बन्हन
कतेक छल मजगूत
एकर बेस थाह त' छल अहीं कें;
कियैक त'
हम्मर सभ अनुमान छल
स्वार्थ'क सोंगर पर टाँगल -
एकटा स्नेहिल घ'र-परिवार'क सपना'क स्वार्थ।
सक भरि लगबैत रहलहुं,
समुच्चा ज़ोर -
नेह, निष्ठा आ आस'क संग
जे
बांचल रहय सभटा पुल,
अनामत - हमरा-आहां'क बीच।
मुदा 
शापित दांपत्य'क धार'क प्रवाह
रसे रसे काटि रहल छल -
हम्मर आत्मा'क कछार कें;
जैं कि
अहूं ध्वस्त करबा'क करैत रहलहुं प्रयास -
ओहि पुल'क गठबंधन कें।
कियैक नहि
बुझि सकलहुं आहां
जे 
बिनु मजगूत खाम्ह'क पुल कें
ह'म आ आहां भ' जायब
जिनगी'क धार कें दू गोट - असंपृक्त कछार।
से देखि लिय' जे
ह'म आ आहां
आबि गेलहुं अप्पन यथार्थ पर
आ साबित भेल जे
अनेर नहि छल हम्मर आशंका;
यैह छल नियति -
हम्मर-आहां'क संबंध'क।
तैं त'
आब हम्मर मोन'क कछार
नहि बनय द' रहल -
कोनो पुल;
अप्पन बाँचल अस्तित्व'क ख़ातिर!
आहां'क संसार में,
हम नहि बनि सकलहुं - आहां सन,
से नहि रहलहुं 
आहां'क संसार'क लायक;
पहिनहुं छलहुं - एकसर,
फेरि रहि गेलहुं - निठ्ठाह एकसर।
की बुझि सकब आहां,
जे अहि बेरि त'
आहां'क संबंध'क दाग
हम्मर नांगट जिनगी'क देह पर
भ' गेल अछि किछु तेना क' देखार;
ई कहाँ रहय देलक हमरा आब
हमरो दुनियाँ कें लायक?
स्तब्ध भेल अछि - हम्मर प्रेमी मोन;
अविश्वास'क शूल उठैत अछि - टूटल हिय सं नित्तह;
एकटा विश्वास'क आ एकटा स्वप्न'क -
ई गति देखैत!

- प्रणव नार्मदेय
२५ दिसंबर, २०१६.

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