रविवार, 4 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - २७

ओहिना... किछुओ....

मोन'क साध मनहि रहि गेल
सभटा पीड़ हिया सहि गेल

प्रीत भरल जिनगी केर सपना
सदिखन हम्मर मन देखल जे
लागय साँचे सपना चमकैत
प्रेम अकास में चान उगल जे
जा'धरि छुबितहुं चान उचकि क'
मृगतृष्णा छल, ओ कहि गेल

हारल मन आ संग आहां केर
बिधि-बिधना'क मिलायल छल जे
अहि गिरहस्ती के बगिया में
सुन्नर फूल फुलायल छल जे
उपवन गमकाबय सं पहिने
कांट'क बीच कोना रहि गेल

अहं आंहां कें कत' पिड़ायल 
कोन कमी भेल नहि बूझल से
साँच हिया हम रीत निमाहल
कियैक आहां कें नहि सूझल से
हम्मर जिनगी'क बाट सरल छल
तैयो कियैक चलल नहि गेल

हम्मर मन में चमकैत सपना
घुप्प अन्हरिया आंहां भरल जे
प्रेमामृत सं फूल गमकितय
तेकरा जारल'क ईर्खा गरल जे
भ'ल पिचायत दू पाट'क बीच
फकरा ई कबिरा कहि गेल

मोन'क साध मनहि रहि गेल
सभटा पीड़ हिया सहि गेल

- प्रणव नार्मदेय 
०४ दिसंबर, २०१६.

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