दिल को लगी है ठेस, आँखें क्यों आबशार
तू है दिल्लगी का मारा तेरा कौन ग़मगुसार
दिल था दिया तुमने जिन्हें बड़े ही शौक़ से
ये आज़ाद तबीयत तेरी उनको थी नागवार
तुम्हारी नज़र में इश्क़ का आला मुक़ाम था
उनकी समझ में यह रहा है हुस्न का व्यापार
यूं प्यार में ख़्वाहिश उन्हें थी इक ग़ुलाम की
जो क़ैद से निकला तो दिल हुआ है दाग़दार
है इक नया सफ़र तुम्हारा मुन्तज़िर ऐ दोस्त
और बीते सफ़र के मोड़ कुछ रहेंगे यादगार
- प्रणव नार्मदेय
२८ दिसंबर, २०१६.
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