शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

मैथिली रचना - ३३

पेस-पीस-स्पेस
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आहां जं
अप्पन 'स्पेस'क खोजी में
ध्वस्त करैत छी
ककरो जिनगी'क 'पेस' आ 'पीस';
सहजें प्रमाणित होइत छी -
साहसी आ क्रांतिकारिणी।
मुदा जं
स्थिर रखबा लेल
अप्पन 'पेस' आ 'पीस'
हेरैत छी कखनहुं अप्पन 'स्पेस';
ह'म घोषित भ' जाइत छी -
अत्याचारी आ व्यभिचारी।
ओना
जौखन बनाबैत अछि
अहं अप्पन 'स्पेस' ककरो मोन में,
तखनहि लगैत अछि -
उखड़' अप्पन 'पेस' 
अखर' अनकर 'पीस' दुन्नू।
त'
कियैक नहि हम-आहां
एक-दोसरा'क हिया में बनबैत छी
अपन-अपन 'स्पेस',
जाहि सं कि
बनल रहय सबह'क जिनगी'क -
'पेस' आ 'पीस'।
कियैक त'
जा'धरि बनल रहत
ईर्खा आ स्वार्थ'क 'स्पेस' 
आओर
नहि खोजी क' सकब
अप्पन 'पीस', सबह'क 'पेस' में,
अहिना बनओने रहत अशांति;
अप्पन 'स्पेस' - जिनगी में।

- प्रणव नार्मदेय
३० दिसंबर, २०१६.

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