इक बात कहूँ सब हार के मैं बस ख़ुद को जीता
अपने ही तो दिल मेरा यूं रहे लूटते गली गली में
दे कर सबके सपन सुनहरे हाथ रहा है मेरा रीता
रग रग मेरा टूट रहा क्या जानूँ मैं कैसी थकन से
मन ये मेरा मरा बारहां जिस्म न जाने कैसे जीता
इतने घाव सहे दिल ने, रोएँगे हम किस किस पे
अब जो मिलता दर्द नया वह भी लगता है मीठा
साथ तुम्हारा एक ज़हर बन बैठा मेरी आदत ही
जाम ए मय एक शिफ़ा तुम बोलो मैं कैसे पीता
सब ही तो हैं मेरे अपने मेरे लिए है इश्क़ इबादत
ये कलमा पढ़ बैठा, क्या पढ़ता क़ुरआं ओ गीता
- प्रणव नार्मदेय
०५ नवम्बर, २०१६.
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