दिलफ़रेब औ' तोताचश्म हर नज़र लगता है
अजीबोग़रीब दस्तूर वाला ये शहर लगता है
बाग़ में घूमते सय्याद, शक्ल में दीवानों की
मासूम परिंदों को नहीं है ये ख़बर, लगता है
गली में लोग निकलते अब बड़ी ख़ामोशी से
बंदज़ुबानों पर सियासत का असर लगता है
मरने मारने को है तैयार इक दूजे को इंसान
रगों में दौड़ रहा मज़हब का ज़हर लगता है
मज़हबों के बड़प्पन की बातें करते हो दोस्त
हर मज़हब यहाँ तंगदिल, तंगनज़र लगता है
न ग़मशरीक़ कोई ख़ुशी में ख़ुश नहीं है यहॉं
इक बियाबां में हो जैसे अपना घर लगता हैबुज़ुर्गों की शफक़त न किलकारी बच्चों की
बग़ैर रिश्तों का घर सूना सा शजर लगता है
खूं के रिश्तों में भी मतलब से मतलब है यहाँ
ख़ुद ही आज़माओ तुम्हें झूठ अगर लगता है
इश्क़ की आड़ में मतलब के खेल सधते यों
सच कहूँ, अब मुहब्बत से बड़ा डर लगता है
असर मंतर औ' दुआओं में क्यों नहीं दिखता
यहाँ ख़ुशियों को लगी, कोई नज़र लगता है
- प्रणव कान्त झा
०४ अक्तूबर, २०१६.
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