रोई न आँखें यूँ न समझ कोई ग़म नहीं
बिखरा तो बार बार मगर सब्र कम नहीं
सुने हैं जहां के तंज़, रोया है दिल बहुत
ये और बात कि पलकें मेरी पुरनम नहीं
दर्दे दिल के लिए है शिफ़ा उसकी हँसी
ज़ख़्मे दिल का यहाँ है कोई मरहम नहीं
ज़ुल्म हैं सहे बहुत रिश्तों के निबाह को
उसके दिल में मगर इक ज़रा रहम नहीं
चला जो उसके दर से मैं होके बदग़ुमान
रोक लेते मेरे पाँव, ऐसी थी क़सम नहीं
नादानियाँ मेरी, सबको बेपर्दा कर गईं
जाना है उसे ख़ूब, अब कोई वहम नहीं
इश्क़ और वफ़ा कि जैसे गुज़री उम्र हो
चाह के मिलेगी जो अब इस जनम नहीं
ख़ुद ही चुनी किरचें मैंने टूटे ख़्वाबों की
तोड़ दे जो हौसला है किसी में दम नहीं
एक दिन तो ले आऊँगा अपने घर ख़ुशी
राह मुश्किल हो मगर रुके हैं क़दम नहीं
- प्रणव कान्त झा
२५ सितंबर, २०१६.
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