घाओ
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जिनगी'क युद्ध में
कैयक बेरि
घाहिल भ' जाइत अछि मनुक्ख।
से घाओ कोनो भ' सकैछ -
शरीर'क
आकि
मोन'क सेहो,
मुदा
शरीर'क घाओ सं बेस मारुक होइछ -
मोन'क घाओ!
शरीर'क घाओ कें त'
जीति आकि हारियो क'
जीबि लैत अछि मनुक्ख,
मुदा मोन'क घाओ'क धाह
जिउतो मनुक्ख कें दैछ हरा
आ
जं हारल मोन से मुइले सन!
बेचियो क' ज़र-जजाति
लोक कीनि लैछ औखधि -
शरीर'क घाओ लेल,
जैं कि सहज भेंट जाइछ ई -
हाट-बजार।
मुदा
कहाँ अछि कोनो दोकान
बिकाइत हो जत' मलहम -
मोन'क घाओ लेल!
एकर मलहम त' थिक -
नेह आ सिनेह,
से ई कहाँ कीनि सकल कियो
बेगरता'क घड़ी; टाका-पैसा सं,
खाह ओ होमय कतबो धन्ना सेठ।
शरीर'क घाओ सं व्यथित
लोक'क कष्ट होइछ - नितांत व्यक्तिगत;
मुदा
मोन'क घाओ ल' जीबैत मनुक्ख
क' सकैछ सर-समाज कें - घबाह
आकि
मनुक्खता कें सेहो - घाहिल,
कैयक बेरि।
कहलहुं ने,
शरीर'क घाओ सं
बेस मारुक होइछ -
मोन'क घाओ!
- प्रणव नार्मदेय
२२ दिसंबर, २०१६.
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