क़तरा क़तरा बहता रहा मैं याद में
क़तरा क़तरा इस पिघलती रात मेंयह तपिश उन तक रसाई पाए तो
क़तरा क़तरा दिल जला यूँ रात में
है उम्र बीता जिसको रब से माँगते
वो है दे गया बस यादें मेरे हाथ में
थी इश्क़ में शिद्दत नहीं शायद मेरे
कि दिल मेरा टूटा ज़रा सी बात में
इस क़दर बरसी सबा हर फूल पर
हूँ ख़ाली दामन मैं रहा इस रात में
था दुआओं पर यक़ीं यूं तो उम्र भर
तेरी बद्दुआ फिर भी रही है साथ में
- प्रणव नार्मदेय
०८ नवम्बर, २०१६.
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