गुरुवार, 22 सितंबर 2016

मैथिली रचना - २०

मोन'क कोन सं
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जिनगी'क साँच-झूठ से सभ हेरिते रहब
हमरा जीवन जिउबा'क से जिबिते रहब

बाट थिक की उचित आओर की सुभीत
बुझू आहां हम त' न'ब बाट चलिते रहब

धर्म-जाति'क भेद आहां कसि धयने रहू
हम ई बन्हन कें तोड़ि आगां बढ़िते रहब

चोट माँझ बाट देब अछि हिस्सक पुरान
नबतुरिया छी ह'म से बरु सम्हरिते रहब

छै इनारे घोरायल भांग कौचर्ज'क एतय
हमरा कर्म'क नशा से बस मताइते रहब

- प्रणव कान्त झा
३० अगस्त, २०१६.

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