सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

जुगनुओं की गवाही

थीं 
जब आँखें नन्हीं
तो 
तारों भरे 
आसमान को देख कर 
हो जाती थीं - एकदम चौड़ी।
अक्सर
आते थे ख़्वाब,
जैसे
क़ैद कर लिया है
तारों को मैंने 
और
टाँग दिया है - घर के कोनों में।
सच कहूँ, 
अक्सर
जी लेता था मैं - वो ख़्वाब, 
जब क़ैद कर लेता 
कुछ जुगनुओं को मुठ्ठी में 
और
बंद कर उन्हें शफ़्फ़ाक मर्तबानों में
टाँग देता उन्हें - सही जगह।
कई रातें 
बिताई गईं - जाग कर,
निहारते हुए - टिमटिमाते जुगनुओं को;
जिन्होंने 
अनजाने सिखाया 
जागती आँखों से सपने देखना।
कई 
अंधेरी और डरावनी रातों में 
साथ रहे ये, 
जैसे
दे रहे हों दिलासा
कि
रात चाहे 
कितनी भी हो डरावनी;
हम हरा सकते हैं - अंदर की रौशनी के सहारे
और
यह भी कि
रात चाहे
कितनी भी हो स्याह;
जाना ही होता है उसे - एकदिन।
उन 
नन्हें जुगनुओं की गवाही में
कई बार
किया वादा ख़ुद से
और 
देखे ख़्वाब कई बार
ख़ुद जुगनू बन कर
औरों की 
अंधेरी रातों की
आशा बन जाने का।
उन
टिमटिमाते 
जुगनुओं की 
नन्हीं रोशनी ने
सालों तक
बारहां
दिखाया है - रास्ता,
जब भी
वक़्त के अंधेरों में 
आने लगा - भटकाव।
मेरे
हमसफ़र दोस्त
प्यारे जुगनुओं!
मुझे 
आज भी
याद हैं वो वादे
पर
क्यों खो जा रही
तुम्हारी रोशनी - जो चली हर वक़्त साथ?
दोस्त!
आज जब
उम्र के सबसे अंधेरे दौर से है -
रहगुज़र मेरा,
कहाँ ढूँढूँ तुम्हें 
कि
खो दिया है मैंने तुम्हें -
उम्र के साथ
और
कंक्रीट के जंगलों ने
विलुप्त कर दिया है -
अस्तित्व तुम्हारा भी।
मगर
इन अंधेरों के पार;
वक़्त 
जब भी खड़ा करे - कटघरे में मुझे,
तुम रहना गवाह
कि 
कभी नहीं भूला मैं;
उन अंधेरी रातों के - सबक़,
उन अंधेरी रातों में किए - वादे।

- प्रणव कान्त झा
03 अक्तूबर, 2016.

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