मुश्किल बहुत होता पर इंसां बनना
तीर ए ज़ुबां के ज़ख़्म हैं गहरे होते
कहाँ आसां मरहम सा ज़ुबां बनना
इश्क़ ओ यक़ीं के सुतूं ना हो फिर
कोई घर तो क्या नहीं मकाँ बनना
लेन-देन पे टिके हों कारोबार जहाँ
यही रिश्तों का होता है दुकां बनना
आसाइशों की हवस बढ़ी इंसानों में
है ख़तरनाक यूं पैसों का ईमां बनना
है दौर बहुत मुश्किल अब तो या रब
आसां है दिलों का अब सामाँ बनना
एक दिल तो हो पुरख़ुलूस मेरी तरह
तो बांकी कहाँ प्यार का जहाँ बनना
जो थे बच्चे बहुत दिल के अमीर रहे
सिक्कों की ग़ुलामी रही जवाँ बनना
- प्रणव कान्त झा
१९ अगस्त, २०१६.
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