रविवार, 2 अक्टूबर 2016

इन्तिक़ाम

तुम कह रहे 
कि 
लोगे तुम इन्तिक़ाम - 
नापाक इरादों में
अपनी नाकामयाबी का।
हाँ,
जिस मुल्क़ की
बुनियाद ही पड़ी हो -
बंद ज़हन और इन्तिक़ाम के
ईंट-गारे से,
उससे
बस यही तो
उम्मीद कर सकते हैं हम।
जबकि
सदा से ही
हमारे ख़ून में
दौड़ते हैं जरासीम -
शांति और सहअस्तित्व का।
वैसे दोस्त
भूलना भी मत
कि 
अगर हमने सीखा है -
शांति, अहिंसा, सहअस्तित्व;
बुद्ध, महावीर, महात्मा और सीमांत गांधी से
तो 
सिखाया है हमें गौरव रक्षा -
पृथ्वीराज, चंद्रगुप्त, लक्ष्मीबाई और टीपू ने।
हाँ,
ये और बात कि
जैसे
तुम्हारे यहाँ मिलते हैं
कभी-कभी -
ईधी, हकीम सईद, परवीन और मलाला;
हमारे यहाँ भी
मिल जाते हैं - 
जयचंद, मीरजाफ़र, गोडसे जैसे लोग
अक़्सर।
वैसे दोस्त!
ज़रा मान भी लो 
हमारी बात
कि
दरअसल
लेना चाहिए तुम्हें इन्तिक़ाम -
अपने 
ख़ुदपसंद अना से, 
ख़ुदगर्ज़ सियासतदां से,
बेज़मीर कठमुल्लों से,
जो बना रहे तुम्हें -
बंद दिमाग़ क़ौम,
नाकाम जम्हूरियत,
और
दहशतगर्द मुल्क!

- प्रणव कान्त झा
02 अक्तूबर, 2016.

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