रविवार, 4 दिसंबर 2016

दिल की बातें - 41

कहां रोया कभी, लो अब रो लिया मैंने 
वक़्त का है सितम, सब खो दिया मैंने 
 
तूफ़ां में टूटते, ऊँचे ही दरख़्तों के शजर
ना जाने क्यों, बड़ा ख़्वाब बो दिया मैंने 

इक झोंके से, फूंकेगी आशियाना ये मेरा
जान कर भी इस शमां को लौ दिया मैंने 

बहुत मशहूर रही, बेफ़िक्री ज़माने में मेरी
इक उसके आते ही, सुकून खो दिया मैंने 

मेरे जज़्बात, वफ़ा, इश्क़, भरम और यक़ीं 
उसने कुछ भी न रखा उसको जो दिया मैंने

ख़ुदपसंदी, ख़ुदसरी, ख़ुदगर्ज़ अना, आज़ादी 
जिसकी ख़्वाहिश थी उसे वही लो दिया मैंने

तमामतर रिश्ते जिसे बोझ की तरह से लगे
उसको रिश्तों से यूं आज़ादी ही तो दिया मैंने 

- प्रणव नार्मदेय 
४ दिसम्बर, २०१६.


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