शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

ठूँठ से.... जीवन

ज़िंदगी
बेशक़ आज लग रही हो
कटे पेड़ के
ठूँठ सी -
नग्न, पत्रहीन,
सूखी, सड़ी, भद्दी
और श्रीहीन।
पर,
चूँकि जड़ें
अब भी धँसीं हैं
गहरी कहीं
अपनी मिट्टी में
और
खींच रहीं रस-गंध।
तो
ज़ाहिर है कि
बदलेगा मौसम
एक दिन
इस ठूँठ से भी जन्मेगा -
नव जीवन;
कोमल, सुन्दर, सुवासित
और
बंटेगा सबमें -
सुख, शीतलता, आनंद;
इसके श्री से।
- प्रणव कान्त झा
०१ अगस्त, २०१५.

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