सोमवार, 14 सितंबर 2015

दिल की बातें - 6

ये ख़्वाबों ही का वक़त है जो हार मानता नहीं
वरना तो रोज़ ही इक जंग हराती उसे दुनियाँ
बड़े-बड़ों की बड़ी भूल, भूल जाते हैं जो अक़्सर
भूल छोटी भी हो हर वक़्त जताती उसे दुनियाँ
कि सारे ज़ुल्म सह के भी हंस ले तो है अच्छा
एक उफ़ के लिए क्या ना सुनाती उसे दुनियाँ
हादसात नामाकूल ज़िंदगी में जो कई उसके
बढ़ता है भूल कर तो खींच लाती उसे दुनियाँ
छोटी सी जंग जीत कर हो जाए जो मदहोश
कि शुक्रिया उसे औक़ात बताती है ये दुनियाँ
- प्रणव कान्त झा
१४ सितम्बर, २०१५.

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