शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

मैं मरा नहीं हूँ

भरने को गहरी सांस रुका, मैं मरा नहीं हूँ।

पलों ने बांधा था जो बाँध
वही अब खोल दिए हैं,
फिर उड़ने को नई उड़ान
लो पर तोल लिए हैं,
बाक़ी है जगह सपनों की, मैं भरा नहीं हूँ।

मुश्किल रस्ते हों लाख
फिर भी मैं चलूँगा,
तदबीर जो है हमराह
ना हाथों को मलूँगा,
जो सड़ जाये जीवनधार, मैं खड़ा नहीं हूँ।

अभी करते हैं जो उपहास
पराये भी, अपने भी,
देखा रोते इनको कई बार
टूटे इनके सपने भी,
थम के ठिठके हैं पांव ज़रा, मैं डरा नहीं हूँ।

धरे कोई मुझपे इल्ज़ाम
कि सपने लूट गया है,
ठोकर देकर कोई सोचे
कि मन टूट गया है,
सह लूँ हर बेज़ा जुल्म, मैं धरा नहीं हूँ।

था भरने को गहरी सांस रुका, मैं मरा नहीं हूँ।

- प्रणव कान्त झा
24 अप्रैल, 2015 

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