गुरुवार, 9 जुलाई 2015

संतरे जैसा देश

बचपन में
पढ़ा था
गुरु जी से
भूगोल की कक्षा में
कि 
पृथ्वी 'संतरे के समान' गोल है
और
सालों बाद
जब पढ़ा रहा था
नागरिक शास्त्र
बिटिया को
तो
ध्यान आया कि
पृथ्वी के इतर
मेरा देश भी है -
'संतरे के समान'।
संघीयता के
छिलके के अंदर,
क्षेत्रीयता के
खंड-खंड कोये में भी,
धर्मांधता, जातीयता और अहं के
दानों में विभक्त।
हर पांच साल में
सजी फ़सल
तोड़ते हैं
ठेकेदार (जातीय नेता)
और बेच देते हैं
ख़रीददारों (क्षेत्रीय क्षत्रप) को।
ये उपभोक्ता
हमेशा से
चूस कर इनकी
एकता और मानवता के
मीठे रस को,
नीरस कर देते हैं
और
भर देते हैं
अपने अंदर का ज़हर
लबालब।
फ़िर
जो भरपूर छिलका
कभी
मज़बूती से बांधे
रखता था कोयों को
अब
होता जा रहा कमज़ोर
हर नयी नस्ल के साथ
और
कभी भी
फ़ाड़ कर इसे
बिखर जाने को
तैयार बैठे हैं -
ज़हर भरे कोये।
- प्रणव कान्त झा
०९ जुलाई, २०१५.

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