शनिवार, 9 मई 2015

माँ

माँ,
अपनी मिट्टी से 
दूर-देश 
हमेशा 
माथे पर अपने 
आशीष भरे तुम्हारे-
चुंबन की महक 
महसूस करता हूँ। 
दुनियांदारी के 
बोझ से लदा-थका 
जब लौटता हूँ घर ,
मेज पर पड़ी 
तेरी तस्वीर के साये-
स्नेहिल आंचल की हवा 
महसूस करता हूँ। 
रोज़ी-रोटी की 
आपाधापी में,
आज भी 
भटकने लगता हूँ 
जब भी रास्ता;
बचपन की मानिंद ,
सबक़ देती, घूरती-
तुम्हारी नज़रों की तपिश
महसूस करता हूँ। 
अब भी,
जब कभी चुभती हैं,
टूटे सपनों की किरचें-
सब्र देती हैं तुम्हारी सीख,
बचपन में जैसे,
कभी ठेस लगने पर ढाढ़स देते- 
तुम्हारे नर्म हाथों के लम्स 
महसूस करता हूँ। 
लगता है,
आज भी जुड़ा हूँ 
गर्भनाल से 
और 
स्पंदित है मेरा जीवन-
तुम्हारी ममता के स्पंदन से। 

- प्रणव कान्त झा 
09 मई, 2015   

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