कुछ दिनों से
फ़िर
गली-गली
हाँक लगाते फिर रहे हैं
वो ही पुराने, शातिर
फ़ेरीवाले
लिए कई तरह के रंगीन चश्में
बेचने को तैयार।
किसिम-किसिम के
चश्में हैं -
धर्म का चश्मा,
जाति का चश्मा,
ज़ोर का चश्मा,
गठजोड़ का चश्मा,
अभिमान का चश्मा,
स्वाभिमान का चश्मा,
क्षेत्रवाद का चश्मा,
राष्ट्रवाद का चश्मा
और हाँ
कुछ ऊँची क़ीमत के
विशिष्ट पैकेज़वाले चश्में भी तो हैं।
पूरा
रंग-बिरंगा
बाज़ार साथ लिए
फ़िर रहे हैं ये
बदरंग फेरीवाले
और
पता चला है
दारू, मुर्ग़ा, प्याज़ फ़्री वाला स्कीम भी है साथ में।
अब हम
दुनियाँ के स्वघोषित
प्राचीन बुद्धिमान लोग
(सुना है बुद्धि की नदी यहीं से बह कर दुनियाँ सींचती है)
ख़रीदेंगे पसंद के चश्में
रंगांध बुद्धि के लिए
ज़मीर को बेच कर भी।
और जब
उतरेगी क़लई चश्मों की
तो
करते रहेंगे
'बुद्धि का बधिया'
चौराहों, चौपालों, चैनलों
और
अख़बार के पन्नों पर;
जैसा करते आ रहे हैं
पिछले कई दशकों से।
फ़िर
गली-गली
हाँक लगाते फिर रहे हैं
वो ही पुराने, शातिर
फ़ेरीवाले
लिए कई तरह के रंगीन चश्में
बेचने को तैयार।
किसिम-किसिम के
चश्में हैं -
धर्म का चश्मा,
जाति का चश्मा,
ज़ोर का चश्मा,
गठजोड़ का चश्मा,
अभिमान का चश्मा,
स्वाभिमान का चश्मा,
क्षेत्रवाद का चश्मा,
राष्ट्रवाद का चश्मा
और हाँ
कुछ ऊँची क़ीमत के
विशिष्ट पैकेज़वाले चश्में भी तो हैं।
पूरा
रंग-बिरंगा
बाज़ार साथ लिए
फ़िर रहे हैं ये
बदरंग फेरीवाले
और
पता चला है
दारू, मुर्ग़ा, प्याज़ फ़्री वाला स्कीम भी है साथ में।
अब हम
दुनियाँ के स्वघोषित
प्राचीन बुद्धिमान लोग
(सुना है बुद्धि की नदी यहीं से बह कर दुनियाँ सींचती है)
ख़रीदेंगे पसंद के चश्में
रंगांध बुद्धि के लिए
ज़मीर को बेच कर भी।
और जब
उतरेगी क़लई चश्मों की
तो
करते रहेंगे
'बुद्धि का बधिया'
चौराहों, चौपालों, चैनलों
और
अख़बार के पन्नों पर;
जैसा करते आ रहे हैं
पिछले कई दशकों से।
प्रणव कान्त झा
३० अगस्त, २०१५.
३० अगस्त, २०१५.
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