बहेलियों ने
बिछा दिए हैं जाल
बिखेर के रंगीन दाने
भड़कीले और पसंदीदा।
पंछी
जो दशकों से
रटते रहे सबक़,
भूल कर सब,
होने लगे हैं मदमस्त
दानों की ख़ुशबू से।
परख कर
इनका मिज़ाज
शातिर बहेलिए
निकाल फेंकेंगे
कुछ और
दिलचस्प दाने।
फिर तो
यक़ीनन
भूल कर इतिहासी सबक़
फँसेंगे ही जालों में -
ये पंछी, आदतन।
और
फँसकर फिर रटेंगे
सबक़ वही पुराना
कि
बहेलिये आएँगे,
दाना डालेंगे,
जाल बिछाएँगे
पर
उनमें फँसना नहीं।
जैसे
हो यही चिरंतन सत्य
पंछी और बहेलिए
के क़िस्से का
और
कोई बदलना भी कहाँ चाहता -
ना पंछी, ना बहेलिये।
बिछा दिए हैं जाल
बिखेर के रंगीन दाने
भड़कीले और पसंदीदा।
पंछी
जो दशकों से
रटते रहे सबक़,
भूल कर सब,
होने लगे हैं मदमस्त
दानों की ख़ुशबू से।
परख कर
इनका मिज़ाज
शातिर बहेलिए
निकाल फेंकेंगे
कुछ और
दिलचस्प दाने।
फिर तो
यक़ीनन
भूल कर इतिहासी सबक़
फँसेंगे ही जालों में -
ये पंछी, आदतन।
और
फँसकर फिर रटेंगे
सबक़ वही पुराना
कि
बहेलिये आएँगे,
दाना डालेंगे,
जाल बिछाएँगे
पर
उनमें फँसना नहीं।
जैसे
हो यही चिरंतन सत्य
पंछी और बहेलिए
के क़िस्से का
और
कोई बदलना भी कहाँ चाहता -
ना पंछी, ना बहेलिये।
-प्रणव कान्त झा
१२ सितम्बर, २०१५.
१२ सितम्बर, २०१५.
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