वो
हर बच्चा था -
मासूम,
नेकदिल और
पाकरूह;
ऐसा ही तो
होता होगा
ख़ुदा भी।
तो फिर
आज
यक़ीनन
ख़ुद को
ख़ुदा का बंदा
साबित करने को
कुछ सरफ़िरों ने
ख़ुदा को ही क़त्ल कर दिया।
तो फिर
क्या इस कुफ़्र के बाद भी
वो
अौरों को काफ़िर
कह पाएंगे?
अपनी
वहशत, दरिंदगी और ज़हालत
से जिहाद में नाक़ाम
ये रहज़न
फिर अौरों को
ज़िहाद सिखाएंगे?
बच्चों को
मौत,
मांओं को
आंसू
का दर्द देकर
ये दरिंदे
क्या अपने बच्चों और मांओं
से नज़र मिलाएंगे?
तो फिर
या ख़ुदाया!
ग़र तुम हो,
ख़ुद को
मोमिन कहने वाले
ये गुनाहगार
क्या वाक़ई तुम्हारी जन्नत
में जगह पाएंगे?
हर बच्चा था -
मासूम,
नेकदिल और
पाकरूह;
ऐसा ही तो
होता होगा
ख़ुदा भी।
तो फिर
आज
यक़ीनन
ख़ुद को
ख़ुदा का बंदा
साबित करने को
कुछ सरफ़िरों ने
ख़ुदा को ही क़त्ल कर दिया।
तो फिर
क्या इस कुफ़्र के बाद भी
वो
अौरों को काफ़िर
कह पाएंगे?
अपनी
वहशत, दरिंदगी और ज़हालत
से जिहाद में नाक़ाम
ये रहज़न
फिर अौरों को
ज़िहाद सिखाएंगे?
बच्चों को
मौत,
मांओं को
आंसू
का दर्द देकर
ये दरिंदे
क्या अपने बच्चों और मांओं
से नज़र मिलाएंगे?
तो फिर
या ख़ुदाया!
ग़र तुम हो,
ख़ुद को
मोमिन कहने वाले
ये गुनाहगार
क्या वाक़ई तुम्हारी जन्नत
में जगह पाएंगे?
- प्रणव कान्त झा
17 दिसंबर, 2014.
17 दिसंबर, 2014.
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