मंगलवार, 21 जुलाई 2015

ईश्वर...तुम हो?

जबकि
करोड़ों लोग
तरसते हों अन्न के बग़ैर,
बच्चे बिलबिलाते हों
भूख़ से कुपोषित हो 
और
तुमको नहला दिया जाता है
टनों घी-दूध
और
मनों चंदन, कुमकुम, रोली से
तो
सच कहना
जी तो मिचलाता होगा ना?
जबकि
लाखों लोग
सोते हों फ़ुटपाथ पर
बेघर ओ बार
सहते हुए धूप, वर्षा, सर्दी की मार
और
तुम्हारे नाम
कर दी जाती हैं
हज़ारों एकड़ ज़मीन,
बना दी जाती हैं
स्वर्णजड़ित अट्टालिकाएं
तो
सच कहना
लज्जा तो आती होगी ना?
जबकि
अरबों लोग
भटकते हों अज्ञानता के तमस में
बेरोज़ी - रोज़गार,
मरते हों एड़ियां रगड़
इलाज़ के बग़ैर हो बीमार
और
खरबों के हथियार ख़रीद
होता हो क़त्ल ओ गारद औ' खूंरेज़ी
मासूमों का; तुम्हारे सदक़े
तो
सच कहना
शर्म तो आती होगी ना?
नहीं तो
फ़िर सही हूँ मैं
कि
तुम हो सिर्फ़
एक निरूपित भ्रम
जिसे रचा है
बेहिस ओ बेईमानों ने
अपने
वर्चस्व के बर्बर
गोरखधंधे के लिए।
- प्रणव कान्त झा
२२ जुलाई, २०१५

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