मंगलवार, 21 जुलाई 2015

रंगों के रंग

बचपन में
भौतिकी की किताब में
पढ़ा था -
प्रकाश के उजास
और 
इन्द्रधनुष की रंगीनी
का रहस्य -
'बै नी आ ह पी ना ला'
(बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल)
और
इन्हीं सात रंगों से
उपजे हैं -
प्रकृति के सबरंग।
फ़िर
ये भी सीखा
कि
रंग महज़ रंग ही
नहीं होते
बल्कि
ये होते हैं सन्देश -
शांति, समृद्धि, ज्ञान, उत्साह
और
प्रकृति का।
अब
जब सीख रहा हूँ
दुनियाँदारी
तो पता चला
कि
रंगों के तो और भी हैं
कई अज़ब रंग
कि
इनके भी होते हैं
अलग-अलग
धर्म, जाति और विचारधारा।
अब
रंग भी होते हैं -
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई;
रंग भी होते हैं -
सवर्ण, पसमांदा, दलित;
रंग होते हैं -
राष्ट्रवादी, समाजवादी और साम्यवादी भी।
पढ़ा था ये भी
कि
जब मिलते हैं सभी रंग इकट्ठे
तो
बनता है प्रकाश
और
फ़ैलता अंधियारा इनके अभाव में
पर
अब तो
तभी होते हैं ये साथ -
जब कालिख़ पोतना हो इंसानियत पर।
हाँ,
एक गुण अब भी है वैसा
कि
कालिख़ छुपी है सफ़ेदी के अंदर
और
जब भी वो आती है बाहर;
चहुँदिशि होता है रक्तिम लाल
और
इंसान का होता एक ही ठौर -
कफ़न की झक्क सफेदी।
- प्रणव कान्त झा
२१ जुलाई, २०१५.

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