आज
फिर पंद्रह अगस्त है।
तो आओ,
लालकिले की प्राचीर से
सात तोपों की सलामी ले
लच्छेदार भाषणों से
अतीत पर
छद्म गौरव जताएँ
शहीदों के नाम
घड़ियाली आँसू बहाएँ
भविष्य के
चमकीले सपने बेच कर
वर्तमान के
मन को बरगलाएं।
फिर
कल से
कुर्सी के पीछे टंगे
शहीदों की तस्वीरों की
नाक के नीचे
लोक की हत्या करेंगे
तंत्र का सट्टा करेंगे
जन को लूट-खसोट
अपनी कोठी भरेंगे
गण को तोड़ेंगे
पुश्तों को तारेंगे
उजले मनों पर
कालिख फ़ेरेंगे।
फिर पंद्रह अगस्त है।
तो आओ,
लालकिले की प्राचीर से
सात तोपों की सलामी ले
लच्छेदार भाषणों से
अतीत पर
छद्म गौरव जताएँ
शहीदों के नाम
घड़ियाली आँसू बहाएँ
भविष्य के
चमकीले सपने बेच कर
वर्तमान के
मन को बरगलाएं।
फिर
कल से
कुर्सी के पीछे टंगे
शहीदों की तस्वीरों की
नाक के नीचे
लोक की हत्या करेंगे
तंत्र का सट्टा करेंगे
जन को लूट-खसोट
अपनी कोठी भरेंगे
गण को तोड़ेंगे
पुश्तों को तारेंगे
उजले मनों पर
कालिख फ़ेरेंगे।
- प्रणव कान्त झा
१५ अगस्त, २०१५.
१५ अगस्त, २०१५.
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