इमारत की नींव
और
मजदूरों में
बड़ी समानता है,
कि
जिस तरह जरूरी है
बहुमंजिली इमारतों के लिए -
मज़बूत नींव,
वैसे ही जरूरी हैं
बहुराष्ट्रीय धंधों के लिए -
मजबूर मज़दूर।
वैसे,
एक बड़ा फ़र्क़ भी है
दोनों में,
कि
जैसे बड़ी इमारत बनाने वाला
कोई कसर नहीं छोड़ता -
नींव को मज़बूत करने में,
वैसे ही बड़ा धंधा बनाने वाला
कोई कसर नहीं छोड़ता -
मजदूर को कमज़ोर करने में।
शायद
सबकी
अपनी- अपनी
ज़रूरत है
और
बाज़ार ज़रूरत ही से चलता है।
पर
जब भी
मज़दूरों ने
मजबूरी की सीमा लांघ ली,
बड़ी वातानुकूलित
इमारतों के अंदर भी
माथे पे पसीने आ जाते हैं,
क्योंकि,
बाज़ार तो
'मांग और आपूर्ति' के नियम से भी चलता है।
- प्रणव कान्त झा
01 मई, 2015.
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