शुक्रवार, 1 मई 2015

मज़दूर

इमारत की नींव
और 
मजदूरों में 
बड़ी समानता है,
कि 
जिस तरह जरूरी है 
बहुमंजिली इमारतों के लिए -
मज़बूत नींव,
वैसे ही जरूरी हैं 
बहुराष्ट्रीय धंधों के लिए -
मजबूर मज़दूर। 
वैसे, 
एक बड़ा फ़र्क़ भी है 
दोनों में,
कि 
जैसे बड़ी इमारत बनाने वाला 
कोई कसर नहीं छोड़ता -
नींव को मज़बूत करने में,
वैसे ही बड़ा धंधा बनाने वाला 
कोई कसर नहीं छोड़ता -
मजदूर को कमज़ोर करने में। 
शायद 
सबकी 
अपनी- अपनी 
ज़रूरत है 
और 
बाज़ार ज़रूरत ही से चलता है। 
पर 
जब भी 
मज़दूरों ने 
मजबूरी की सीमा लांघ ली,
बड़ी वातानुकूलित 
इमारतों के अंदर भी 
माथे पे पसीने आ जाते हैं,
क्योंकि,
बाज़ार तो 
'मांग और आपूर्ति' के नियम से  भी चलता है। 

- प्रणव कान्त झा 
01 मई, 2015. 

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