मंगलवार, 3 जनवरी 2017

मैथिली रचना - ३४

कर्म'क फसलि
****************

धन्यवादी छी हम तोहर
हे बितलाहा साल!
तों देलह ढकिया भरि उपहार
जिनगी'क निस्सन अनुभव'क
आ 
पढ़ओलह बहुतो पाठ
अस्सल जिनगी जिउबा'क।
त'
कियैक दिय' जतरा काल तोरा
कोनो उपराग
जं लागल ठेस - हम्मर मोन आ ओकर आस्था कें,
जं भेंटल पैंच - बेस दु:ख, दर्द आ घात अपनहि सं!
जं सत्त कही,
ई सभ त' छलहुं अपने बेसाह कयने
किछु अंधविश्वास आ बेपरवाही'क किम्मति पर ह'म
आ 
किछु त' भेंटल वैह, जे देलहुं हम दोसरा कें
तों त' रहलह एकटा गबाह मात्रे -
हम्मर सभ कर्म'क।
तोहर देल अनुभव'क छाहरि में 
करैत छी हम स्वागत - आगंतुक समय-साल कें;
फेरि बेस आस-उम्मेद सं।
ओना 
जं नहि बदलल ह'म
आ 
हम्मर आस्था, विश्वास ओ कर्म
त' 
की बदलि सकत किछु अहू साल?
कियैक त'
समय त' होइछ एकटा जोतल चास मात्र,
जाहि पर कियो रोपैत अछि -
अप्पन कर्म'क बीआ,
पटबैत अछि आस-उम्मेद'क पानि,
छिटैत अछि अप्पन जतन कें खाद
करैत रहैत अछि कमौट - विवेक'क खुरपी सं।
से जेहन बीआ; तेहने फसलि!
त' आबह हे नबका साल!
रोपी तोरा छाती पर - किछु उचित कर्म,
उगाबी किछु हरियर, फरगर फसलि,
नब आस-उम्मेद'क संग -
अप्पन उचित जतन सं।

- प्रणव नार्मदेय
०१ जनवरी, २०१७.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें