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कहिया तक करब
छुच्छ अतीत'क गुणगान
कहिया तक घोखब
पुरखे'क मान बखान?
मिथिला माने
अगबे
जनक-जानकी,
मंडन-भारती,
अयाची-विद्यापति सन
बड़का-बड़का
ना' टा थोड़बेक छै!
मिथिला माने
बड़का-बड़का शहर'क
कि
सात समुद्दर पार विदेश'क
अकास छुबैत,
वातानुकूलित दफ़्तर में बैसल
मोट कैंचा कमा,
बेस घर-जजाति अरजैत
कोनो भरिगर गोत्र-मूल'क
कुलदीपके सभ टा सेहो नहि।
मिथिला माने
हम-आहां,
ई-ओ,
खेत जोतैत कोनो रामखेलाओन,
दूध दूहैत कोनो किसुन,
बकरी-महींस चरबैत कोनो बिसुन,
आ कि
नोन-तेल-लकड़ी कें जोगाड़ में
दिल्ली-बंबई, असाम-पंजाब जाइत
कोनो जीबछ, बौका कि बुझाओन सेहो।
मिथिला माने
आँगन-घर नीपैत कोनो सरोसत्ती,
गोबर-करसी करैत कोनो बुधनी,
चौर-चांचड़ में घाम चुआबैत कोनो रामेस्सरी,
भनसाघर में रान्ह करैत कोनो दिपुआ'क माय
संगहि
हक्कल डाईन-जोगिन होयबा'क दंश सहैत,
गाम-टोल सं बारल कोनो मसोमाति
अल्लां पुर कि फल्लां पुर वाली बूढ़ी सेहो।
मिथिला माने
कोनो गोखुर टंगने
पंडी जी'क मुँह सं निकसैत
वेद, स्मृति, गायत्री/सावित्री, जनऊ, दूर्वाक्षत मंत्र
कि
कोनो त्रिपुंड ढौरने
जोतखी जी'क लाल मोसि सं खतियाओल
टिप्पैन, टिपौत कि लाल किताब'क
रेखे टा नहि छैक।
मिथिला माने
मुरेठ्ठा बन्हने
कोनो ह'र जोतैत हरबाह'क
ग'र सं निकसैत
अाल्हा, सलहेस, कुमर बृजभान'क टेर
संगहि
घाम बहबैत
कोनो ज'न-मजूर'क
हर-कोदारि सं पारल,
खेत-चास'क सीना पर चमकैत
आरि-मेढ़ सेहो।
हे मीत!
राखू अखियास
जे
कोनो जाति, समाज हो कि सभ्यता
ओकर अतीते टा नहि
वर्तमान आ भविष्य सेहो होइछ
संगहि
अतीत ख़ाली चमकैते
कि
वर्तमान-भविष्य अन्हारे सेहो कहाँ!
से
हम-आहां
एतेक जे ई-ओ सभ,
आजु'क वर्तमान
काल्हु'क अतीतो त' होयब!
तखन त'
कने मोन पारू ने
जे
की-की रचै-बसबै छी
हम-आहां-ओ
आई
जाहि सं कि
सिद्ध होमय सभ'क जबावदेही
आ
गौरब गान करय
हम्मर-आहां'क संतति?
औ संगी,
त' किएक ने
ल' हाथ में हाथ,
मिलाबी कान्ह सं कान्ह,
लगाबी बुद्धि आ बल
सभ संग मिलि
बनयबा लेल
एकटा नब पहिचान,
सभ्य आ सहृदय - मनुक्ख'क,
समय सं डेग मिलाबैत - समाज'क,
मानवता'क गुण सं बोरल - सभ्यता'क
आ गढ़ी
एकटा नव न्यायोचित इतिहास -
आबय बला पीढ़ी'क लेल।
जं से नहि त'
अपनहि कहने क़ाबिल सभ
सं भरले अछि घरही -
सगरो मिथिला।
- प्रणव कान्त झा
३० जून, २०१६.
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