उफ़्फ़ ये ख़ामोशी ना मार डाले किसी को
उस पर यह सितम हैं रूठ जाते वो झट से
ना असरपा रही थीं जिन दिलों पर सदाएं
वो दिल किस तरह से रो दें उनके ख़त से
ना ख़ुश रख पाए हम जिन्हें जां देकर भी
वह जहां हंस पड़ा देखो उनकी इशरत से
बड़ी कोशिशें की, ना मिला रंग ए इश्क़ां
है धनक कैसे बिखरा उनकी ख़जालत से
एक रिश्ता बाँधने में इश्क़ कम पड़ रहा है
हैं सारा जहां बाँधतीं वह ज़रा एक लट से
- प्रणव कान्त झा
०३ जुलाई, २०१६.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें