दिल दरिया बन बैठा जबसे
प्यार बँटा फिर नहरों नहरों
शजर का टूटा पत्ता मैं ज्यों
तिरता रहा हूँ लहरों लहरों
जो ख़ुशबू अंदर बसनी थी
ढूंढ़ा किया मैं शहरों शहरों
नपे तुले अहसास ही बाँटो
ग़ज़ल बंटे ज्यों बहरों बहरों
कहनी थी तो बात ज़रा सी
फिर भी कह पाए ना पहरों
हैं सांसें बस चंद बचीं अब
तुम थोड़ी घड़ियाँ ही ठहरो
- प्रणव कान्त झा
२८ जून, २०१६.
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