इश्क़ रूहानी तुम्हें पता ही नहीं
मैं कहाँ इश्क़ ए फ़ानी चाहता हूँ
फ़र्ज़ी अफ़साने बड़े फैले हैं यहाँ
मैं कोई सच्ची कहानी चाहता हूँ
बात कुछ तो हो तेरे-मेरे दरमियाँ
कहां मैं कोई बदग़ुमानी चाहता हूँ
सर्द से पड़ रहे जज़्बात हर तरफ़
अब रग़ ए ख़ूं में रवानी चाहता हूँ
ज़रूरतें अपनी मैंने महदूद रक्खीं
सफ़र में ज़रा आसानी चाहता हूँ
दिल की बातें ना इस शहर में करो
नहीं मसला कोई तूफ़ानी चाहता हूँ
- प्रणव कान्त झा
०८ जून, २०१६.
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