शुक्रवार, 17 जून 2016

जीवन - एक दृष्टिकोण - 2

ये जीवन सुन्दर सरल नहीं 
इतनी भी बुरी है कहाँ सखे
सुख दुख हैं आते रहते ज्यों
मधुमोदक खा कड़वा चखें

पहले धरिणी जो तपे रवि से
तब नभ से शीतल बरसें बूँदें 
जब पोर पोर दुखता श्रम से
तो विश्राम को हम आँखें मूँदें

जब लड़ती शिलाओं से धारा
तो ही बनती वह धीर सरित
सह आतप बीज जो सड़े गले
तो करें धरा को शस्य हरित

परहित जो हलाहल पान करे
बनता शिव, विश्व उसे पूजे
निशि दिवस सर्पदंश जो सहे
दे वह सुगंध औ' शीश सजे

दाब ताप असीमित सह कर
हीरक तो विश्व श्रृंगार करे
जो सहे समय के आतप को
जग से उचित व्यवहार करे

उर जैसी अभिलाषाएँ पाले
वैसा ही प्रयास करें हम तो
कुछ भी नि:शुल्क नहीं यहाँ 
है मूल्य उचित देना हमको

है पौरुष संघर्षों में ही दिखता
सुख के समय सब कार्य सधे 
माना जीवन सुन्दर सरल नहीं 
पर इतनी भी बुरी है कहाँ सखे

- प्रणव कान्त झा
१८ जून, २०१६.

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