मैं था निस्सीम, अथाह प्रिये
मुझको सीमित तुम्हीं ने किया
तुम लांछित मुझे भले कर लो
सारे ही दोष मुझ पर धर लो
नद सा था छलकता प्रेम मेरा
जिसको बाधित तुम्हीं ने किया
हर चोट सहा तुमसे जो मिला
जाने किस भाव से तुमने दिया
कोमल था हृदय मेरा शाश्वत
इसको पाषाण तुम्हीं ने किया
इक स्वप्नशील मैं जीव सखे
थे सारे स्वप्न, तुमसे ही जुड़े
संग चलना था जिन राहों पे
उनको ध्वस्त तुम्हीं ने किया
था निर्णय बड़ा कठिन लेना
अस्तित्व दाँव पर था मेरा
समझौतों के सारे प्रयास
हर बार विफल तुम्हीं ने किया
जो हुआ वही है अटल अब तो
था यही प्रेम प्रारब्ध मेरा
सारा अतीत अब छोड़ चलूँ
निर्णय को विवश तुम्हीं ने किया
जल बाँध तोड़ बह चुका भला
किस तरह बाँध पाओगी उसे
प्रत्यंचा से जो शर छूट चुका
उसका संधान तुम्हीं ने किया
हैं सब रस्ते जब बंद हो चुके
हा! रोओ भी तो क्या मिलना
मन को बाँधो, अब आगे बढ़ो
जब यह चुनाव तुम्हीं ने किया
मैं हूँ निस्सीम, अथाह प्रिये
मुझे यह सीमा तुम्हीं ने दिया।
- प्रणव कान्त झा
०४ जून, २०१६.
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