कि फिर इंसां की तरह जी ना सकूँ
इतना तो ऊँचा ना बिठाओ मुझको
जो फिर ख़ुद को भी छू ही ना सकूँ
जो थे ज़हीर, सब हुए हैं यों ज़ाहिर
तू ख़ालिस है यक़ीं कर ही ना सकूँ
यों उठ गया इश्क़ ए फ़ानी से यकीं
जो मिले अमरित तो ले भी ना सकूँ
वक़्त से ग़मों की रफ़ूगरी मैं सीखता
ऐसे ना हवा दो कि उन्हें सी ना सकूँ
हर घूँट ज़हर, बन गयी आदत मेरी
आबे ज़मज़म दो तो मैं पी ना सकूँ
इक ज़ियादा तू भी ज़िद न कर अब
दो क़दम हो मौत मैं मर भी ना सकूँ
- प्रणव कान्त झा
०३ जून, २०१६.
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