उसने कर रक्खा है क़ैद ख़ुद से ख़ुद को
उसका क़ातिल उसकी क़सम न हो जाए
लग तो जाऊँ गले दर्द से है यारी अपनी
मगर उसको फिर कोई भरम न हो जाए
तिश्नगी हो रही तब्दील अश्क़ में उसकी
यूं ही इश्क़ का मुझको वहम न हो जाए
जख़्म सूखे भी नहीं जो हैं दिए माज़ी ने
दिल एक बार फिर नाफ़हम न हो जाए
मिरा कातिब ए नसीब रहा मुझसे ख़फ़ा
फिर नाक़द्र सफ़र का जनम न हो जाए
मुश्किलें सफ़र की कहाँ डराती मुझको
डर तो है कि सफ़र ही ख़तम न हो जाए
मिटे दर्द कि तोड़ दे वो क़फ़स की तीली
क्यों वह भी मेरा ही हमक़दम न हो जाए
- प्रणव कान्त झा
०१ जून, २०१६.
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