शुक्रवार, 17 जून 2016

दिल की बातें - 31

दिल पर अब ज़ोर नहीं रहा उसका
अब तो वो उसका कहा नहीं करता

उनका दीदार जो ना होता इक बार
दिन कोई मुकम्मल फिर नहीं रहता

उसके ख़यालों में इस क़दर है गुम
याद उसे अब यह जहाँ नहीं रहता

अजीब ख़ुश्बुओं से दरपेश है वह 
होश और उसको कुछ नहीं रहता

जबसे उसने किया इज़हार ए वफ़ा 
वह किसी और से कुछ नहीं कहता

अब तो दरिया हुआ है उसका दिल
नैनों से अश्क़ का नहर नहीं बहता

दीवानगी इक अजीब शय है हज़रत 
जो ये हो तो इन्सान कुछ नहीं रहता

- प्रणव कान्त झा
१७ जून, २०१६.

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