ओहिना... किछुओ...
काग कुचरैत देखल अहि मरुभूमि में
गाम सहजें हमर फेरि मोन पड़ि गेल।
चान बूझल रहय मोन शीतल करय
मुदा सैह चान हृदय'क कोन गड़ि गेल।
मोन पड़ि गेल बाबा कें खिस्सा-कथा
आओर बाबी के आँचर कें नेहो सखा
ओ चिंतित सदति भावी लेल हमर
कने खटगर आ मिठगर हमर जे पिता
दूध-भात'क जे बाटी लेने हाथ में
आगा-पाछां करैत माय मोन पड़ि गेल।
छल कितकित खेलैत, कनियां-पुतरा सेहो
छोट बहिन बहिनपा कें चंगो करैत
सुनि सांझ पहर भूत प्रेत'क कथा
भरिदिनुक सभ बहादुर छलहुं जे डरैत
इस्कूलो जाय संग रहय खेलो में
सभ संगी ओ नेनपनि कें मोन पड़ि गेल।
खेत पोखरि घुमैत, खेलैत आ पढ़ैत
हमहूं बढ़ि गेलहुं साल आगां बढ़ल
छुटल गाम'क मीत, न'ब संगी बनल
नब उमंगो चढ़ल किछु सपनहुं गढ़ल
चललहुं हम जखन गाम'क सीमान धरि
नेह भरि जे चलल नैन मोन पड़ि गेल।
मन-मनोरथ कें पाछां भागैत चलैत
चलि अयलहुं जे हम परदेस में
मोन अछि जे मुदा खन-खन ल' चलय
अपनहि माटि में, अपनहि देस में
गाम हम्मर जे मोन'क खज्जन चिड़ै
जानि कोन चिल्होरि ल' सोन उड़ि गेल।
प्रणव कान्त झा
०३ फ़रवरी, २०१६.
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