ज़िंदगी गर तुम बेवफ़ा हो तो रहो
उसकी हर साँस में तारी है वफ़ा
सारे जहान से नाराज़ बेशक हो रहे
अपने महबूब से कब होता है ख़फ़ा
सबके दर्द का है अब एहतराम उसे
सौदा ए इश्क़ में जो मिली है जफ़ा
जाहिरन जो दिखता नुक़सान यहाँ
रुह के ग़ल्ले में बन गिरता है नफ़ा
रंग-ए-इश्क़ में ज़ोर बहुत होता है
खोटे को खरा करता है बाज़ दफ़ा
- प्रणव कान्त झा
०५ फ़रवरी, २०१६.
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