गौरबे आन्हर जे भेल फिरय
अप्पन सहरजमीन जे बिसरल
ठोकर खाय मुँह भ'र गिरय
परभाखा बरु मौसिए सन नेही
माय'क आंचरक गन्ह कतय
अप्पन सन कतबहु ओ लागओ
परदेस में माटि'क रंग कतय
जानि कोन पापें देस छुटल अछि
आबहु चेतू औ मैथिल प्राण
माय केर जं सम्मान देलहुं नहि
केहन होयत भावी संतान
माय'क मुँह सं सुनल-गुनल जे
जाहि सं भेटल जीवन'क ज्ञान
पहिलुक आखर 'माय' सिखौलक
माय'क बोल मैथिली कें प्रणाम
- प्रणव कान्त झा
२१ फ़रवरी, २०१६.
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