जी ही लेता तेरे बग़ैर भी ज़िंदगी
जो ये सांसें तेरी असीर ना होतीं
मिट ही जाती हस्ती दीवानों की
अगर आशिक़ी कबीर ना होतीं
लहलहाती जो इश्क़ की फ़सलें
तो ये दुनियाँ यूँ फ़क़ीर ना होतीं
और कई सपने तामीर पा होते
ग़र कुछ नज़रें हक़ीर ना होतीं
बेनूर होते दिलों के दरीचे यहां
जो मोहब्बतें ख़ुद ज़हीर ना होती
- प्रणव कान्त झा
२८ जनवरी, २०१६.
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