शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

दिल की बातें - 15

अब तो वो लोग रहे ना ही लगावट पहले जैसी
देखते देखते किस तरह से यह नज़ारा हो गया

कल तलक हिल मिल कर हँसते बोलते थे घर 
कैसी हवा चली कि ज़ख़्मी ये भाईचारा हो गया

उस शहर में सब ही साँझा बाँटते ख़ुशी ओ ग़म 
तकसीम इस तरह क्यों सबका किनारा हो गया

अब तो हमने तुमने बदले हैं रंगो बू के भी मायने
यूं मज़हबों को भी रंगे ख़ूं का ही सहारा हो गया

सारे बुज़ुर्गो पीर बताते रहे मुहब्बत के फ़लसफ़े
दरमियाँ नफ़रतों का शोला क्यों शरारा हो गया

शोर चारों तरफ़ है बरपा सब अलग अलग खड़े
तू ही सही, यूँ तो इंसानियत का ख़सारा हो गया

- प्रणव कान्त झा
१८ फ़रवरी, २०१६.

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