किताब ए ज़िंदगी के हरेक सफ़्हे ने मेरी
तेरी बख़्शीशों का हिसाब छुपा रक्खा है
होता जो पास तेरे क़दम ही चूम लेता मैं
मेरा हर दर्द यूँ तूने दिल में दबा रक्खा है
तेरे नाम ही से मिल जाती दिल को राहत
जैसे तपती रेत पे किसी ने सबा रक्खा है
मर्ज़ ए जहान की दवा तो होगा कोई खुदा
यां इलाजे ग़म की शिफ़ा तूने दुआ रक्खा है
- प्रणव कान्त झा
१४ फ़रवरी, २०१६.
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