शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

दिल की बातें - 17

हर ग़ाम बिछती है यहाँ शतरंज की बिसातें 
कि हर कोई अपनी-अपनी गोटी फैंकता है

जल रही है यां आग ख़ुदगर्ज़ी की हर तरफ़ 
औ' कोई दूर बैठा अपनी ही रोटी सेंकता है

कल तलक थे जिसे सब मालिकां समझते
अब नौकर ही उनको हड्डी-बोटी फैंकता है

उसके तालिबां ही देखो उसे देते सबक़ अब
और जो उस्ताद था चुपचाप बैठा देखता है

हैं जो अच्छे-भले, बिखरते रहे यां-वहाँ पर
गुनहगारों में तो देखो कि कितनी एकता है

- प्रणव कान्त झा
२६ फ़रवरी, २०१६.

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