नमाज़ ए इश्क़ के कलमे तुझे कब याद रहे
मेरे दिल ने दुआ की फिर भी तू आबाद रहे
राह ए इश्क़ कहाँ आसान दौर कोई भी रहा
जो भी राहरू रहे इसके अक्सर बरबाद रहे
सफ़र ए ज़िंद में नाकाम मैं कई मरहलों पे
मगर तेरा सफ़र तो हर मोड़ पर नाबाद रहे
दिल ए नाशाद मैं हरदम खड़ा राहों में तेरी
कूंचा ए यार तेरा हर वक़्त ही पर शाद रहे
बड़ा हूँ ख़ुशफ़हम, इतना ही से ख़ुश रहूँगा
दिल ए नाज़ुक में अपनी भी कोई याद रहे
- प्रणव कान्त झा
२२ फ़रवरी, २०१६.
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