सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

मैथिली रचना - १२

हे 
बरू ठीके 
कहैत छह तों!
ई जे
पैघ लोक सभ
(जाति सं, मोन सं नहि)
आई
खौंझायल, 
फनफनाइत छथुन
भरि बाकुट मिरचाई लागल सन,
से ई
वैह छथि
जे काल्हि तक
तोहर अधिकार कें 
पोन त'र दबा
भीखो जकां देबा सं करैत छलाह
नामंज़ूर।
तोहर
ख़ून पसीना कें
राकस सन चूसि
लाल बुन्न भेल रहैत छलाह जे
तनिका
आब ज'र धरैत छन्हि
तोहर
फहराइत
हनुमानी पतक्खा देखि।
ठीके 
कहैत छह तों
जे 
भेटबाक चाही तोरो
बरोबरि होयबाक हक्क
आ से बरु 
भेंटिये रहल छह आई
(खाह ओ भरम'ले सन)।
देखह
काल'क डांग
जे 
काल्हि छोट आ नीच कहि
मौगति करैत
छलथुन्ह तोहर
से
छोट आ नीच 
कहयबाक लेल
आंदोलन करैत छथि आई।
से
बरु आई
जे सत्ता'क कुंजी
तोरा हाथ
त' 
तोंहूं ज' करह
ओहने व्यवहार
लएह अपन प्रतिशोध
त' से बेजाय नहि -
अन्याय तं किन्नहुं नहि।
मुदा संगी,
रखिह' 
ई सदति मोन
जे समय के चक्का जड़ नहि
ओ घुमैत रहैत अछि
सदिखन
से 
जे काल्हि उप्पर ओ आई निच्चां
एकर उनटो ओतबहि साँच।
हे मीत
रखिह' अखियास
जे 
जं आँखि'क सन्ता आँखि 
आ 
हाथ'क सन्ता हाथें भ' जाय न्याय
त'
सगरो दुनियाँ 
भरि जायत लुल्ह आ आन्हर सं।
ओना
जं ई पैघ लोक सभ
देखओने रहितथि मोन'क
अस्सल पैघत्व 
त' बेगरते कोन छल 
अहि सभ'क,
त' दोस!
तोंही करह मोन कें पैघ
आ 
करह क्षमा पुरखा सभ कें
सुनल जे
क्षमा सं पैघ कोनो प्रतिशोध नहि।

- प्रणव कान्त झा
२२ फ़रवरी, २०१६.

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